कन्चन का प्लान तो सफ़ल हो गया और ससुर जी के इरादे भी बिल्कुल साफ़ हो गये थे लेकिन कन्चन अभी तक ससुर जी के लंड के दर्शन नहीं कर पायी थी।
एक दिन फिर से सासु मां को शहर जाना था। इस बार रामलाल ने फिर उन्हें अकेला ही भेज दिया। बीवी के जाने के बाद वो कन्चन से बोला, "बहु आज बदन में बहुत दर्द हो रहा है ज़रा कमला को बुला दो। बहुत अच्छी मालिश करती है। बदन का दर्द दूर कर देगी।"
ये सुन के कन्चन को जलन होने लगी। वो जानती थी कमला कैसी मालिश करेगी। कन्चन ने सोचा आज अच्छा मौका है। सासु मां भी नहीं है।
वो बोली, "क्यों पिताजी? घर में बहु के रहते आप किसी और को क्यों मालिश के लिये बुलाना चाहते हैं? आपने हमारी मालिश कहां देखी है? एक बार करवा के देखिये, कमला की मालिश भूल जाएंगे।"
"अरे नहीं बेटी, हम अपनी बहु से कैसे मालिश करवा सकते हैं?" रामलाल के मन में लड्डू फूटने लगे। वो सोच रहा था की ये तो सुनहरा मौका है। हाथ से नहीं जाने देना चाहिये।
"आप हमें बेटी बोल रहे हैं लेकिन शायद अपनी बेटी की तरह नहीं मानते? आपकी सेवा करके हमें बहुत खुशी मिलती है।"
"ऐसा ना कहो बहु। तुम बेटी के समान नहीं हमारी बेटी ही हो। तुम सचमुच बहुत अच्छी हो। लेकिन तुम्हारी सासु मां को पता चल गया तो वो मुझे मार डालेगी।"
"कैसे पता चलेगा पिताजी वो तो शाम तक आएगी। चलिये अब हम आपकी मालिश कर देते हैं। आपको भी तो पता चले की आपकी बहु कैसी मालिश करती है।"
"ठीक है बहु। लेकिन अपनी सासु मां को बताना नहीं।"
"नहीं बताएंगे पिताजी, आप बेफिक्र रहिये।"
रामलाल ने जल्दी से ज़मीन पे चटाई बिछा दी और धोती को छोड़ के सब कपड़े उतार के लेट गया। उसका दिल धक धक कर रहा था। कन्चन रामलाल के गठे हुए बदन को देखती ही रह गयी। वाकई में सच्चा मर्द था। चौड़ी छाती और उसपे घने काले बाल देख कर तो कन्चन के दिल पे छुरिआं चलने लगी। कन्चन ने रामलाल की टांगों की मालिश शुरु कर दी। साड़ी के पल्लु से उसने घूंघट भी कर रखा था। बहु के मुलायम हाथों का स्पर्श रामलाल को बहुत अच्छा लग रहा था। कन्चन ने पहले से ही प्लान बना रखा था। अचानक तेल की बोतल कन्चन की साड़ी पे गिर गयी।
"ऊफ हमारी साड़ी खराब हो गयी।"
"बहु साड़ी पहन के कोई मालिश करता है क्या। खराब कर ली ना अपनी साड़ी? चलो साड़ी उतार लो, फिर मालिश करना।"
"जी, मैं सलवार कमीज़ पहन के आती हूं।"
"अरे उसकी क्या ज़रूरत है? साड़ी उतार लो बस। सलवार पे तेल गिर गया तो सलवार उतारनी पड़ जाएगी। अगर सलवार उतारना मंज़ूर है तो ठीक है सलवार कमीज़ पहन आओ।"
"हाय सलवार कैसे उतारेंगे। सलवार उतारने से तो अच्छा है कि साड़ी ही उतार दूं, लेकिन आपके सामने साड़ी कैसे उतारुं? हमें तो शरम आती है।’
"शरम कैसी बहु? तुम तो हमारी बेटी के समान हो। और फिर हम तो तुम्हें पेटिकोट ब्लाउज में कई बार देख चुके हैं। अपने ससुर से कोई शर्माता है क्या?"
"ठीक है पिताजी। उतार देती हूं।" कन्चन ने बड़ी अदा के साथ अपनी साड़ी उतार दी। अब वो केवल पेटिकोट और ब्लाउज में थी। पेटिकोट उसने बहुत नीचा बांध रखा था। ब्लाउज भी सामने से लो-कट था। अचानक कन्चन कमरे से बाहर भागी.
"अरे क्या हुआ बहु कहां जा रही हो?" रामलाल ने पूछा।
"जी बस अभी आई। अपनी चुन्नी तो ले आऊं।" रामलाल तो बहु के ऊपर नीचे होते हुए नितम्बों को देख कर निहाल हो गया।
कन्चन थोड़ी देर में वापस आ गयी। अब उसने चुन्नी से घूंघट निकाल रखा था। लेकिन कमर पे बहुत नीचे बंधे पेटिकोट और लो-कट ब्लाउज में से उसकी जवानी बाहर निकल रही थी। कन्चन रामलाल के पास बैठ गयी और उसने फिर से रामलाल की टांगों की मालिश शुरु कर दी। इस वक्त कन्चन का सिर रामलाल के सिर की ओर था। मालिश करते हुए बहु इस प्रकार से झुकी हुई थी की लो-कट ब्लाउज में से उसकी बड़ी बड़ी झूलती हुई चूचिआं रामलाल को साफ़ दिखाई दे रही थी। मालिश करते हुए दोनों इधर उधर की बातें कर रहे थे। कन्चन को अच्छी तरह मालूम था की ससुर जी की नज़रें उसके ब्लाउज के अन्दर झांक रही हैं। आज तो कन्चन ने ठान लिया था कि ससुर जी को पूरी तरह तड़पा के ही छोड़ेगी। मर्दों को तड़पाने की कला में तो वो माहिर थी ही।
इतने में रामलाल ने बहु से पूछा, "बहु तुमने वो गाना सुना हई, चुन्री के नीचे क्या है? चोली के पीछे क्या है?"
"जी पिताजी सुना है। आपको अच्छा लगता है।?" कन्चन आगे झुकते हुए ससुर जी को अपनी गोरी गोरी चूचिओं के और भी ज़्यादा दर्शन कराती हुई बोली।
"हां बहु बहुत अच्छा लगता है।" कन्चन समझ रही थी की ससुर जी का इशारा किस ओर है। ससुर जी की जांघों तक मालिश करने के बाद कन्चन ने सोचा की अब ससुर जी को उसके नितम्बों के दर्शन कराने का वक्त आ गया है। कन्चन जानती थी की उसके नितम्ब मर्दों पर क्या असर करते हैं। उसने जांघों से नीचे की ओर मालिश करने के बहाने अब अपना मुंह ससुर जी के पैरों की ओर और अपने विशाल चूतड़ ससुर जी के मुंह की ओर कर दिये। मालिश करते हुए उसने अपने चूतड़ों बड़े ही मादक ढंग से पीछे की ओर उभार दिया। रामलाल के दिल पे तो मानो छुरी चल गयी। पेटिकोट के महीन कपड़े में से बहु की गुलाबी रंग की कच्छी झांक रही थी।
रामलाल बहु के विशाल चूतड़ों को ललचायी नज़रों से देखता हुआ बोला, "अरे बहु ऐसे मालिश करने में परेशानी होगी। हमारे ऊपर आ जाओ।"
"हाय राम आपके ऊपर कैसे आ सकते हैं?"
"अरे इसमें शर्माने की क्या बात है? अपनी एक टांग हमारे एक तरफ़ और दूसरी टांग दूसरी तरफ़ कर लो।"
"जी आपको परेशानी तो नहीं होगी?"
कन्चन रामलाल के ऊपर आ गयी। अब उसका एक घुटना ससुर जी के कमर के एक तरफ़ और दूसरा घुटना कमर के दूसरी तरफ़ था। पेटिकोट घुटनों तक ऊपर करना पड़ा। इस मुद्रा में कन्चन के विशाल चूतड़ रामलाल के मुंह के ठीक सामने थे। घुटनों से नीचे कन्चन के गोरे गोरे पैर नंगे थे। कन्चन रामलाल के पैरों की ओर मुंह करके उसकी जांघों से नीचे की ओर मालिश कर रही थी। रामलाल का मन कर रहा था की बहु के चूतड़ों के बीच मुंह दे दे। वो पेटिकोट के महीन कपड़े में से बहु के विशाल चूतड़ों पे सिमटती हुई कच्छी को देख रहा था।
"बहु तुम जितनी समझदार हो उतनी ही सुन्दर भी हो।"
"सच पिता जी? कहीं आप हमें खुश करने के लिये तो नहीं बोल रहे हैं।"
"तुम्हारी कसम बहु हम झूठ क्यों बोलेंगे? तभी तो हमनें तुम्हें एकदम राकेश के लिये पसन्द कर लिया था। शादी से पहले तुम्हारे पीछे बहुत लड़के चक्कर लगाते होंगे?"
"जी वो तो सभी लड़किओं के पीछे चक्कर लगाते हैं।"
"नहीं बहु सभी लड़किआं तुम्हारी तरह सेक्सी नहीं होती। बोलो, लड़कें बहुत तंग करते थे क्या?"
"हां पिता जी करते तो थे।"
"क्या करते थे बहु?"
"अब हम आपको वो सब कैसे बता सकते हैं?"
"अरे फिर से वही शर्माना। चलो बताओ। हमें ससुर नहीं, अपना दोस्त समझो।"
"जी सीटियां मारते थे। कभी कभी तो बहुत गन्दे गन्दे कमैन्ट भी देते थे। बहुत सी बातें तो हमें समझ ही नहीं आती थी।"
"क्या बोलते थे बहु?"
"उनकी गंदी बात हमें समझ नहीं आती थी। लेकिन इतना ज़रूर पता था की हमारी छातिओं और नितम्बों पे कमैन्ट देते थे। कैसे खराब होते हैं लड़के। घर में मां बहन नहीं होती क्या?"
"और क्या क्या करते थे?"
"जी, क्लास में भी लड़कें जान बूझ के अपनी पेन्सिल हमारे पैरों के पास फेंक देते थे और उसे उठाने के बहाने हमारी स्किर्ट के अन्दर टांगों के बीच में झान्कने की कोशिश करते थे। स्कूल की ड्रेस स्किर्ट थी नहीं तो हम सलवार कमीज़ ही पहन के स्कूल जाते। लड़कें लोग होते ही बहुत खराब हैं।"
"नहीं बहु लड़कें खराब नहीं होते। वो तो बेचारे तुम्हारी जवानी से परेशान रहते होंगे।"
"लेकिन किसी लड़की पे गंदे गंदे कमैन्ट देना और उसकी टांगों के बीच में झांकना तो बदतमीज़ी होती है ना पिताजी?"
"इसमें बदतमीज़ी की क्या बात है बहु। बचपन से ही हर मर्द के मन में औरत की टांगों के बीच में झान्कने की इच्छा होती है और जब वो बड़ा हो जाता है तब तो औरत की टांगों के बीच में पहुंचना ही उसका लक्ष्य बन जाता है।"
"हाय! ये भी क्या लक्ष्य हुआ? मर्द लोग तो होते ही ऐसे हैं।"
"लेकिन बहु लड़कियां भी तो कम नहीं होती। देखो ना आज कल तो शहर की ज्यादातर लड़कियां शादी से पहले ही अपना सब कुछ दे देती हैं। तुम भी तो शहर की हो बहु।"
"अच्छा पिता जी! क्या मतलब आपका? हम वैसे नहीं हैं। इतने लड़कें हमारे पीछे पड़े थे, यहां तक कि कई मास्टर जी लोग भी हमारे पीछे पड़े थे, लेकिन हमने तो शादी से पहले ऐसा वैसा कुछ नहीं किया।"
"सच बहु? यकीन नहीं होता की इतनी सेक्सी लड़की को लड़कों ने कुंवारा छोड़ दिया होगा।"
"हमने किसी लड़कें को आज तक हाथ भी नहीं लगाने दिया।"
"आज तक? बेचारा राकेश अभी तक कुन्वारा ही है। सुहाग रात को भी हाथ नहीं लगाने दिया?" रामलाल हंसता हुआ बोला।
"हां...पिता जी आप तो बहुत खराब हैं। सुहाग रात को तो पति का हक बनता है। उन्हें थोड़े ही हम मना कर सकते हैं।" कन्चन बड़े ही मादक ढंग से अपने चूतड़ों को रामलाल के मुंह की ओर उचकाती हुई बोली। रामलाल कन्चन के चूतड़ों से सिमट कर उनके बीच की दरार में जाती हुई कच्छी को देख देख कर पागल हो रहा था।
"बहु एक बात कहुं? तुम शादी के बाद से बहुत ही खूबसूरत हो गयी हो।"
"पिता जी आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे शादी से पहले हम बद्सूरत थे।"
"अरे नहीं बहु शादी से पहले भी तुम बहुत सन्दर थी लेकिन शादी के बाद से तो तुम्हारी जवानी और भी निखर आई है। हर लड़की की जवानी में शादी के बाद एकदम निखार आ जाता है।"
"ऐसा क्यों पिताजी?" कन्चन ने भोलेपन से पूछ.
"बहु, शादी से पहले लड़की एक कच्ची कली होती है। कली को फूल बनाने का काम तो मर्द ही कर सकता है ना। सुहाग रात को लड़की एक कच्ची कली से फूल बन जाती है। जैसे कली में फूल बनके निखार आ जाता है वैसे ही लड़की की जवानी में शादी के बाद निखार आने लगता है।"
"ऐसा क्या निखार आया हमारी जवानी में? हम तो पहले भी ऐसे ही थे।"
"बहु तुम्हारी जवानी में क्या निखार आया वो हमसे पूछो। तुम्हारा बदन एकदम भर गया है। कपड़े भी टाईट होने लगे हैं। देखो ये नितम्ब कैसे फैल गये हैं।" रामलाल कन्चन के दोनों चूतड़ों पे हाथ फेरता हुआ बोला।
"तुम्हारी ये कच्छी भी कितनी छोटी हो गयी है। करीब करीब पूरे ही नितम्ब इस कच्छी के बाहर हैं। शादी से पहले तो ऐसा नहीं था ना?"
आखिर कन्चन का प्लान सफ़ल होने लगा था। रामलाल का हाथ उसके उचके हुए चूतड़ों को सहला रहा था। कभी कभी रामलाल उसकी पैंटी लाईन पे हाथ फेरता। कन्चन को बहुत मज़ा आ रहा था।
रामलाल फिर बोला, "बहु लगता है तुम्हें ये गुलाबी रंग की कच्छी बहुत पसन्द है?"
"हाय! पिताजी आपको कैसे पता हमने कौन से रंग की कच्छी पहनी है?"
"बहु तुम्हारे नितम्ब हैं ही इतने चौड़े की उनके ऊपर कसे हुए पेटिकोट में से कच्छी भी नज़र आ रही है।"
"हाय राम! पिताजी हमें सलवार कमीज़ पहनने दीजिये। हमें शरम आ रही है।"
"अरे बहु शरम कैसी तुम तो हमारी बेटी के समान हो।" रामलाल कन्चन की कच्छी पे हाथ फेरता हुआ बोला। कन्चन भी रामलाल की टांगों पे मालिश करने का नाटक कर रही थी। रामलाल बहु के विशाल नितम्बों को दबाता हुआ बोला, "बहु तुम राजेश का ख्याल तो रखती हो ना?"
"जी आप बेफिकर रहिये हम उनका बहुत ख्याल रखते हैं। जब हम आपका इतना ख्याल कर सकते हैं तो क्या उनका नहीं करेंगे? उन्हें हमसे कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।"
"शाबाश बहु हमें तुमसे यही उम्मीद थी। लेकिन हमारा मतलब था की इस लाजवाब जवानी को बेकार तो नहीं कर रही हो। राजेश को खुश तो रखती हो। वो जो कुछ चाहता है उसे देती हो ना।"
"जी वो जो चाहते हैं हम उन्हें देते हैं। जैसा खाना पसन्द है वैसा ही बनाते हैं।" कन्चन रामलाल का मतलब अच्छी तरह समझ रही थी लेकिन अन्जान बनने का नाटक कर रही थी।
"बहु, तुम तो बहुत भोली हो। हम खाने पीने की बात नहीं कर रहे। खाने पीने के इलावा भी मर्द की ज़रूरतें होती हैं जिंहें अगर बीवी पूरा ना करे तो मर्द दूसरी औरतों के पास जाने लगता है। उसे अपनी जवानी रोज़ देती हो कि नहीं?"
कन्चन शर्माने का नाटक करती हुई बोली, "पिताजी आप ये कैसी बातें कर रहे हैं? हमें तो बहुत शरम आ रही है।"
"अपने ससुर से क्या शर्माना बहु? हमारी बहु खुश है या नहीं ये जानना हमारा फर्ज़ है। बोलो है या नहीं?"
"जी है।"
"तो फिर बताओ उसे रोज़ देती हो या नहीं?" रामलाल का हाथ अब फिसल कर कन्चन के चूतड़ों की दरार में आ गया था। वो उसके चूतड़ों की दरार में हाथ फेरता हुआ बोला "बोलो बहु शर्माओ नहीं।"
"ज्ज्ज...जी, वो जब चाहते हैं ले लेते हैं। हम कभी मना नहीं करते।"
"वो जब चाहता है तब लेता है। तुम अपने आप कभी नहीं देती हो?"
"हुम तो औरत हैं। पहल करना तो मर्द का काम होता है।" कन्चन ने मन ही मन सोचा की रामलाल ने कितने सफ़ाई से लेने देने की बातें शुरु कर दी थी और अब तो उसके चूतड़ों की दरार में भी हाथ फेर रहा था। सचमुच ससुर जी काफ़ी मंझे हुए खिलाड़ी थे।
रामलाल बोल रहा था,"बहु तुम इतनी सेक्सी हो। वो नालायक तो तुम्हारी रोज़ लेता होगा?"
"पिता जी प्लीज़...! आप ये सब क्यों पूछ रहे हैं? हुमें तो बहुत शरम आ रही है।"
"अभी हमनें कहा था की हमारा बेटा और बहु खुश हैं या नहीं ये जानना हमारा फ़र्ज़ है। जबाब दो। रोज़ लेता तो है ना तुम्हारी?"
"नहीं पिताजी ऐसी कोई बात नहीं है। उन्हें तो फुर्सत ही नहीं मिलती। ओफ़िस से थक के आते हैं और जल्दी ही सो जाते हैं। महीने में मुश्किल से एक दो बार ही.....हमें तो लगता है की शायद हम इतने सैक्सी हैं ही नहीं कि हम उन्हें रिझा सकें।"
"कैसी बातें करती हो बहु? तुम तो इतनी सन्दर ओर सेक्सी हो कि तुम्हें कपड़ों में देख कर भी किसी बाल ब्रह्मचारी का लंड खड़ा हो जाए और अगर नंगी हो जाओ तब तो भगवान भी अपने पे काबू नहीं कर सकते।" पहली बार रामलाल ने कन्चन के सामने लंड जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। चूतड़ों की दरार में हाथ रगड़ने और रामलाल के मुंह से इस तरह की बातें सुन के कन्चन की चूत गीली होने लगी थी।
वो शर्माने का नाटक करते हुए बोली, "हाय! पिताजी आप अपनी बहु के सामने ये कैसे गन्दे शब्द बोल रहे हैं? हमें तो बहुत शरम आ रही है। प्लीज़ अब हमें जाने दीजिये ना।"
रामलाल दोनों हाथों से कन्चन के विशाल चूतड़ों को दबाता हुआ बोला, "अरे बहु इसमें शर्माने की क्या बात है। अब मर्द के लंड को लंड नहीं तो और क्या कहें? बोलो तुम्हारे पास लंड के लिये कोई और शब्द है तो बताओ।"
कन्चन शर्माने का नाटक करती हुई चुप रही।
"अरे बहु बोलो! चुप क्यों हो?"
"जी हमें नहीं पता। हमनें भी लड़कों के मुंह से ये ही शब्द सुना है।"
"तो फिर लंड को लंड कहने में शरम कैसी? लेकिन बहु महीने में सिर्फ़ एक दो बार से तुम्हारा काम चल जाता है? तुम्हारी इस जवानी को तो रोज़ मर्द की ज़रूरत है।"
"अब हम कर भी क्या सकते हैं?"
"उसे तुम्हारी पसन्द तो है न?"
"जी, हमें क्या पता?"
"ये बात तो हर औरत को पता होनी चाहिये। वैसे कुछ मर्दों को वो औरतें पसन्द होती हैं जिनकी बहुत फूली हुई होती है। तुम्हारी कैसी है बहु?" रामलाल मज़े लेता हुआ बोला।
"जी हमें क्या पता?"
"बहु तुम्हें कुछ पता भी है? चलो हम ही पता कर लेते हैं हमारी बहु रानी की कैसी है।" ये कहते हुए रामलाल ने कन्चन के चूतड़ों के बीच हाथ डाल कर पेटिकोट के ऊपर से ही उसकी फूली हुई चूत को अपनी मुट्टी में भर लिया। बाप रे क्या फूली हुई चूत थी बहु की।
ये कहते हुए रामलाल ने कन्चन के चूतड़ों के बीच हाथ डाल कर पेटिकोट के ऊपर से ही उसकी फूली हुई चूत को अपनी मुट्टी में भर लिया। बाप रे क्या फूली हुई चूत थी बहु की।
"ऊइइइइइइइइई.......इइस्स्स...। पिता जी !आआआह....... प्लीज़! ये आप क्या कर रहे हैं? छोड़िये ना....। हम आपकी बहु हैं।" लेकिन कन्चन ने अपनी चूत छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। बल्कि अपनी टांगें इस प्रकार से चौड़ी कर ली और चूतड़ ऊपर की ओर उचका दिये कि उसकी चूत रामलाल के हाथ में ठीक तरह से समा जाए। कन्चन के पूरे बदन में वासना की लहर दौड़ रही थी।
"क्या छोड़ू बहु?"
"वही जो आपने पकड़ रखी है। प्लीईइइइइज......छोड़िये ना आह आह......"
"हमनें क्या पकड़ रखी है? बता दो तो छोड़ देंगे।"
"वही जो औरतों की टांगों के बीच में होती है।"
"क्या होती है बहु?"
"ऊफ! पिताजी आप तो बड़े वो हैं! छोड़िये ना हमारी...प्लीज़...आह"
"जब तक बताओगी नहीं कि क्या छोड़ें तब तक हमें कैसे पता चलेगा की क्या छोड़ना है?"
"हाय राम! हमें सचमुच नहीं पता उसे क्या कहते हैं। आप ही बता दीजिये।"
"बहु तुम इतनी भी भोली नहीं हो। चलो हम ही बता देते हैं। इसे चूत कहते हैं।"
"ठीक है हमारी....हमारी..च..चूत छोड़ दीजिये प्लीज़...हम आपकी बहु हैं।"
"हां, अब हुई ना बात बहु। ’चूत’ बोलने में इतना शर्माती हो, कहीं चूत देने में भी तो इतना नहीं शर्माती? तभी बेचारा राकेश तुम्हारी ले नहीं पाता होगा।" रामलाल कन्चन की चूत मुट्ठी में मसलता हुआ बोला।
"इस्स्स्स्स्स......... क्या कर रहे हैं? प्लीज़ छोड़िये ना हमारी..."
"पहले बताओ, चूत देने में भी इतना शर्माती हो?"
"नहीं, पहले आप हमारी छोड़िये। फिर बताऊंगी।"
"फिर वही बात। हमारी छोड़िये, हमारी छोड़िये कर रही हो। आखिर क्या छोड़ें?"
"ऊफ पिता जी आप तो बहुत ही खराब हैं। प्लीज़ हमारी चूत छोड़ दिजिये। हम तो आपकी बेटी के समान हैं।"
"ठीक है बहु ये लो छोड़ देते हैं।" जैसे ही रामलाल ने कन्चन की चूत को आज़ाद किया वो रामलाल के ऊपर से उठ कर साईड में बैठ गयी।
"पिताजी आप तो बड़े खराब हैं। अपनी बहु के साथ ऐसा करता है कोई? अब हम आपकी मालिश साईड में बैठ कर ही करेंगे।"
"अरे बहु की चूत पकड़ना मना है क्या? ठीक है साईड में बैठ के मालिश कर दो। लेकिन बहु तुम्हारी चूत तो बहुत फूली हुई है। मर्द तो ऐसी ही चूत के लिये तरसते हैं। अब बताओ, अपनी इस प्यारी चूत को देने में तो शरम नहीं करती हो।"
"जी, देने में किस बात की शरम? वैसे भी जब वो लेते हैं तो लाईट बन्द होती है। उन्हें कैसे पता चलेगा की हमारी कैसी है?"
"शबाश बहु चूत देने में कोई शरम नहीं करनी चाहिये। लेकिन वो नालायक लाईट बन्द करके चोदता है तुम्हें? तुम जैसी सन्दर और सेक्सी औरत को तो नंगी देखने के लिये भगवान भी तड़प जाए। औरत को चोदने का मज़ा तो उसे पूरी तरह नंगी करके ही आता है। और उसकी नंगी जवानी का रस पान करने के लिये लाईट जला के चोदना तो ज़रूरी है।" कन्चन ने नोटिस किया की रामलाल ने अब ‘लेने देने’ की जगह ‘चोदने’ जैसा शब्द बोलना शुरु कर दिया था।
"लेकिन पिता जी वो तो ऐसा कुछ भी नहीं करते।"
"तुम्हारा मतलब वो तुम्हें नंगी तक नहीं करता?"
"जी नहीं।" कन्चन शर्माते हुए बोली।
"तो फिर?"
"फिर क्या?"
"तो फिर कैसे चोदता है वो हमारी प्यारी बहुरानी को?"
"बस पेटिकोट ऊपर उठा के...."
"बहुत ही नालायक है। लेकिन उसका लंड बड़ा तो है न?"
"जी वो तो खासा लम्बा और मोटा है।"
"उस गधे के लंड जैसा? तब तो हमारी बहु की तृप्ति कर देता होगा।"
"हाय...! उस गधे के जितना तो किसी का भी नहीं हो सकता, और फिर सिर्फ़ बड़ा होने से कुछ नहीं होता। मर्द को भी तो औरत को तृप्त करने की कला आनी चाहिये। वो तो अक्सर पैंटी भी नहीं उतारते, बस साईड में करके ही कर लेते हैं।"
"ये तो गलत बात है। ऐसे तो हमारी बहु की प्यास शान्त नहीं हो सकती। लेकिन बहु तुम्हें ही कुछ करना चाहिये। अगर औरत काम कला में माहिर ना हो तो मर्द दूसरी औरतों की ओर भागने लगता है। बीवी को बिस्तर में बिल्कुल रंडी बन जाना चाहिये तभी वो अपने पति का दिल जीत सकती है।"
"आपकी बात सही है पिताजी, हम तो सब कुछ करने के लिये तयार हैं। लेकिन मर्द अपनी बीवी के साथ जो कुछ भी करना चाहता है उसके लिये पहल तो उसे ही करनी होती है ना। वो जो भी करना चाहें हम तो हमेशा उनका साथ देने के लिये तैयार हैं।"
"हमें लगता है की हमारी बहु प्यासी ही रह जाती है। क्यों सही बात है?"
"जी।"
"कहो तो हम उसे समझाने की कोशिश करें? ऐसा कब तक चलेगा ?"
"नही नहीं पिताजी, उनसे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है।"
"तो फिर ऐसे ही तड़पती रहोगी बहु?"
"और कर भी क्या सकते हैं?"
रामलाल को अब विश्वास हो गया था कि उसका बेटा बहु के जिस्म की प्यास को नहीं बुझा पता है। इतनी खूबसूरत जवानी को इस तरह बर्बाद करना तो पाप है। अब तो उसे ही कुछ करना होगा। कन्चन फिर से रामलाल की टांगों की मालिश करने लगी। कन्चन का मुंह अब रामलाल की ओर था। बार बार इस तरह से झुकती की उसकी बड़ी बड़ी चूचिआं और ब्रा रामलाल को नज़र आने लगते। रामलाल अच्छी तरह जानता था कि आज सुनेहरा मौका था। लोहा भी गरम था। आज अगर बहु की जवानी लूटने में कामयाब हो गया तो ज़िन्दगी बन जाएगी। रामलाल का लंड बुरी तरह फनफनाया हुआ था, और टाईट लंगोट की साईड में से आधा बाहर निकल आया था और उसकी जांघ के साथ सटा हुआ था।
रामलाल बोला, "देखो बहु तुम चाहती हो तुम्हारी जवानी की आग ठंडी हो?"
"जी कौन औरत नहीं चाहती?"
"हम तुम्हारे ससुर हैं। तुम्हारी जवानी की आग को ठंडा करना हमारा धर्म है। हमें ही कुछ करना होगा।"
"आप क्या कर सकते हैं पिताजी? हमारी किस्मत ही ऐसी है।" कन्चन एक ठंडी सांस लेते हुए रामलाल की जांघ पे तेल लगती हुई बोली।
"ऐसा ना कहो बहु। अपनी किस्मत तो अपने हाथ में होती है। अरे बहु, तुमने हमारी कमर से ले के टांगों तक तो मालिश कर दी लेकिन एक जगह तो छोड़ ही दी।"
"कौन सी ?"
"अरे धोती के नीचे भी बहुत कुछ है। वहां भी मालिश कर दो।"
"जी वहां...?"
"भई नहीं करना चाहती हो तो कोई बात नहीं हम वहां कमला से मालिश करवा लेंगे।"
"नहीं नहीं पिताजी कमला से क्यों? हम हैं ना।" कन्चन ने शर्माते हुए रामलाल की धोती ऊपर कर दी। नीचे का नज़ारा देख के उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। कसे हुए लंगोट का उभार देखने लायक था। कन्चन ने लंगोट वाले इलाके को छोड़ के लंगोट के चारों ओर मालिश कर दी।
"लीजिये पिताजी वहां भी मालिश कर दी।"
"बहु वहां तो अभी और भी बहुत कुछ है।"
"और तो कुछ भी नहीं है।"
"ज़रा लंगोट के नीचे तो देखो बहुत कुछ मिलेगा।"
"हाय.....! लंगोट के नीचे! वहां तो आपका वो है। हमें तो बहुत शरम आ रही है।"
"शरम कैसी बहु? तुम तो ऐसे शर्मा रही हो जैसे कभी मर्द का लंड नहीं देखा।"
"जी किसी पराए मर्द का तो नहीं देखा ना।"
"अच्छा तो तुम हमें पराया समझती हो?"
"नहीं नहीं पिता जी ऐसी बात नहीं है।"
"अगर ऐसी बात नहीं है तो इतना शर्मा क्यों रही हो? वो तुम्हें काटेगा नहीं। चलो लंगोट खोल दो ओर वहां की भी मालिश कर दो।"
"जी हम तो आपकी बहु हैं। हम आपके उसको कैसे हाथ लगा सकते हैं?"
"ठीक है बहु कोई बात नहीं, वहां की मालिश हम कमला से करवा लेंगे।"
"नहीं नहीं पिताजी ये आप क्या कह रहे हैं? किसी परायी औरत से तो अच्छा है हम ही वहां की मालिश कर दें।"
"तो फिर शर्मा क्यों रही हो बहु?" ये कहते हुए रामलाल ने बहु का हाथ पकड़ के लंगोट पे रख दिया। लंगोट के ऊपर से ससुर जी के मोटे लंड की गर्माहट से कन्चन कांप गयी। कांपते हुए हाथों से कन्चन ससुर जी का लंगोट खोलने की कोशिश कर रही थी। आखिर आज ससुर जी का लंड देखने की मुराद पूरी हो ही जाएगी। जैसे ही लंगोट खुला रामलाल का लंड लंगोट से अज़ाद होके एक झटके के साथ तन के खड़ा हो गया। ११ इन्च के लम्बे मोटे काले लंड को देख के कन्चन के मुंह से चीख निकल गयी।
"ऊइई माआआआ....ये क्या है..?"
"क्या हुआ बहु...?"
"जी..इतना लम्बा..."
"नहीं पसन्द आया?"
"जी वो बात नहीं है। मर्द का इतना बड़ा भी हो सकता है? सच पिताजी ये तो बिकुल उस गधे के जैसा है। अब समझी सासु मां आपको क्यों गधा कहती हैं।"
"घबराओ नहीं बहु हाथ लगा के देख लो। काटेगा नहीं।" कन्चन मन ही मन सोचने लगी काटेगा तो नहीं लेकिन मेरी चूत ज़रूर फाड़ देगा। बाप का लंड तो बेटों के लंड से कहीं ज़्यादा तगड़ा निकला कन्चन उस फौलादी लौड़े को सहलाने के लिये बेचैन तो थी ही। उसने ढेर सारा तेल अपने हाथ में ले के रामलाल के तने हुए लौड़े पे मलना शुरु कर दिया। ना जाने कितनी चूतों का रस पी के इतना मोटा हो गया था। क्या भयन्कर सुपाड़ा था। मोटा लाल हथोड़े जैसा। कुन्वारी चूत के लिये तो बहुत खतरनाक हो सकता था। कन्चन को दोनों हाथों का इस्तेमाल करना पड़ रहा था, फिर भी रामलाल का लौड़ा उसके हाथों में नहीं समा रहा था। इतना मोटा था कि दोनों हाथों से उसकी मोटाई नापनी पड़ी। जब जब कन्चन का हाथ लंड पे मालिश करते हुए नीचे की ओर जाता, लंड का मोटा लाल सुपाड़ा और भी ज़्यादा भयन्कर लगने लगता।
"पिता जी एक बात पूछुं? बुरा तो नहीं मानेंगे?"
"नहीं बहु ज़रूर पुछो।"
"जी सासु मां तो आपसे बहुत खुश होंगी?"
"वो क्यों?" रामलाल अन्जान बनता हुआ बोला।
"इतना लम्बा और मोटा लौड़ा पा कर के कौन औरत खुश नहीं होगी?"
"अरे नहीं बहु ये ही तो हमारी बदकिस्मती है। बस एक गलती कर बैठे, उसका फल अभी तक भुगत रहे हैं।"
"कैसी गलती पिताजी?"
"अरे बहु सुहाग रात को जोश जोश में कुछ ज़्यादा ज़ोर से धक्के मार दिये और पूरा लंड तुम्हारी सासु मां की चूत में पेल दिया। तुम्हारी सासु मां तो कुन्वारी थी। झेल नहीं सकी। बहुत खून खराबा हो गया था। बेचारी बेहोश हो गयी थी। बस उसके बाद से मन में इतना डर बैठ गया की आज तक चुदवाने से डरती है। बड़ी मिन्नत करके ६ महीने में एक बार चोद पाते हैं, उसके बाद भी आधे से ज़्यादा लंड नहीं डालने देती।"
"ये तो गलत बात है। पति की ज़रूरत पूरी करना तो औरत का धर्म होता है। कोशिश करती तो कुछ दिनों में सासु मां की आदत पड़ जाती।"
"क्या करें हमारी दास्तान भी कुछ तुम्हारे जैसी है।"
"ओह ! फिर तो आप भी हमारी तरह प्यासे हैं।"
"हां बहु। सासु मां को तो हमारा पसन्द नहीं आया लेकिन तुम्हें हमरा लंड पसन्द आया या नहीं?"
"जी ये तो बहुत प्यारा है। इतना बड़ा तो औरत को बड़े नसीब से मिलता है। सच, हमें तो सासु मां से जलन हो रही है।" कन्चन बड़े प्यार से रामलाल के लौड़े को सहलाते हुए बोली। उसने फिर से अपना मुंह रामलाल की टांगों की ओर और चूतड़ रामलाल के मुंह की ओर कर रखे थे। लंड और टांगों की मालिश करने के बहाने वो आगे की ओर झुकी हुई थी और चूतड़ रामलाल की ओर उचका रखे थे।
"अरे इसमें जलन की क्या बात है? आज से ये तुम्हारा हुआ।" रामलाल बहु के चूतड़ों पे हाथ फेरता हुआ बोला।
"जी मैं आपका मतलब समझी नहीं।"
"देखो बहु, हमसे तुम्हारी बर्बाद होती ये जवानी देखी नहीं जाती। हमारे रहते हमारी प्यारी बहु तड़पती रहे ये तो हमारे लिये शर्म की बात है। आखिर हम भी तो मर्द हैं। हमारे पास भी वो सब है जो तुम्हारे उस नालायक पति के पास है। अब हमें ही अपनी बहु की प्यास बुझानी पड़ेगी।" रामलाल का हाथ पेटिकोट के ऊपर से ही बहु के विशाल चूतड़ों की दरार में से होता हुआ उसकी चूत पे आ गया।
"हाय....! पिता जी ये आप क्या कह रहे हैं? आपका मतलब आप हमें....अपनी बहु को..?"
"हां बहु हम अपनी बहु को चोदेंगे। तुम्हारी इस जवानी को एक मोटे तगड़े लौड़े की ज़रूरत है। हमारी टांगों के बीच में अब भी बहुत दम है।" रामलाल का हाथ अब धीरे धीरे बहु की टांगों के बीच उसकी फुली हुई चूत को पेटिकोट और पैंटी के ऊपर से ही सहला रहा था।
"पिता जी..! प्लीज़..! ऐसा नहीं कहिये। हम आपके जज्बात समझते हैं लेकिन आखिर हम आपकी बहु हैं। आपके बेटे की पत्नी हैं। आपकी बेटी के समान हैं।" कन्चन रामलाल के बड़े बड़े टट्टों को सहलाती हुई बोली।
"ये सब सही है। तुम हमारी बहु हो, हमारी बेटी के समान हो। तभी तो हमारा फर्ज़ है कि हम तुम्हें खुश रखें। कोई गैर औरत होती तो हमें चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। लेकिन अपनी ही बहु के साथ ऐसा अत्याचार हो ये हमें मन्ज़ूर नहीं।" रामलाल ने ये कहते हुए बहु की चूत को अपनी मुट्ठी में भर के दबा दिया।
"इस्स्स्स्स...... अआह..छोड़िये ना पिताजी, आपने तो फिर पकड़ ली हमारी। सोचिये बेटी के समान बहु के साथ ऐसा करना पाप नहीं होगा?" कन्चन ने अपनी चूत छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। बल्कि टांगें इस प्रकार चौड़ी कर ली की रामलाल अच्छी तरह उसकी चूत पकड़ सके।
रामलाल बहु की चूत को और भी ज़ोर से मसलता हुआ बोला, "तो क्या ये जानते हुए भी की बेटी के समान बहु की चूत प्यासी है हम चुप बैठे रहें? जब बहु मायका छोड़ के ससुराल आती है तो ससुराल वालों का फर्ज़ बनता है की वो अपनी बहु की सब ज़रूरतों का ख्याल रखें।"
"लेकिन हमने तो आपको पिता के समान माना है, अब आपके साथ ये सब कैसे कर सकते हैं।"
"ठीक है बहु, अगर हमारे साथ नहीं कर सकती तो कोई बात नहीं हम गावं में एक ऐसा तगड़ा मर्द ढूंढ लेंगे जिसका लंड हमारी तरह लम्बा हो और जो हमारी बहु को अच्छी तरह चोद के उसके जिस्म की प्यास बुझा सके। बोलो ये मन्ज़ूर है?"
"हाय राम!.....ये क्या कह रहे हैं? किसी दूसरे से तो अच्छा है कि आप ही..." कन्चन दोनों हाथों से अपना मुंह छुपाती हुई बोली।
"इसमे शर्माने की क्या बात है? बोलो क्या कहना चाहती हो बहु?" रामलाल ने अब अपना हाथ बहु के पेटिकोट के अन्दर डाल दिया था और उसकी जांघें सहला रहा था।
"जी। हमारा मतलब था की अगर इतनी ही मजबूरी हो जाए तो घर की इज़्ज़त तो घर में रहनी चाहिये। किसी गैर मर्द को हम अपनी जवानी कैसे दे सकते हैं? हमारी इज़्ज़त घर वालों के पास ही रहेगी।"
"तो तुम हमें तो गैर नहीं समझती हो?"
"नहीं नहीं, पिताजी आप गैर कैसे हो सकते है?"
"सच बहु तुम जितनी खूबसूरत हो उतनी ही समझदार भी हो। घर की इज़्ज़त घर में ही रहनी चाहिये। तुम्हारी सब ज़रूरतें घर में ही पूरी की जा सकती हैं। हम इस बात का पूरा ध्यान रखेंगे कि तुम्हें किसी गैर मर्द के लंड की ज़रूरत ना महसूस हो।" रामलाल समझ गया था की बहु भी वासना की आग में जल रही है क्युंकि उसकी कच्छी उसकी चूत के रस से बिल्कुल भीग चुकी थी। लेकिन अपने ससुर से चुदवाने में झिझक रही थी। बहु की झिझक दूर करने के लिये उसे शुरु में थोड़ी ज़ोर ज़बर्दस्ती करानी पड़ेगी। लोहा गरम है, अगर अभी इस सुनहरे मौके का फयदा नहीं उठाया तो फिर बहु को नहीं चोद पायेगा। लेटे लेटे तो कुछ कर पाना मुश्किल था। रामलाल उठ के खड़ा हो गया।
"क्या हुआ पिता जी आप कहां जा रहे हैं?"
"कहीं नहीं बहु, अब तुम ठीक से सब जगह तेल लगा दो।"
रामलाल के खड़े होते ही उसकी धोती और लंगोट नीचे गिर गये। अब वो बिल्कुल नंगा बहु के सामने खड़ा था। उसका तना हुआ ११ इन्च का मोटा काला लंड बहुत भयन्कर लग रहा था। ये नज़ारा देख के कन्चन की तो सांस ही गले में अटक गयी। उसने खड़े हुए ससुर जी की टांगों में तेल लगाना शुरु किया। ससुर जी का तना हुआ लौड़ा उसके मुंह से सिर्फ़ कुछ इन्च ही दूर था। कन्चन का मन कर रहा था की उस मोटे मूसल को चूम ले।
"बहु थोड़ा हमारी छाती पे भी मालिश कर दो।"
ससुर जी की छाती पे मालिश करने के लिये कन्चन को भी खड़ा होना पड़ा। लेकिन ससुर जी का तना हुआ लंड उसे नज़दीक नहीं आने दे रहा था।
वो ससुर जी को छेड़ते हुए हंसती हुई बोली, "पिता जी, आपका गधे जैसा वो तो हमें नज़दीक आने ही नहीं दे रहा, आपकी छाती पे कैसे मालिश करें?"
"तुम कहो तो काट दें इसे बहु?"
"हाय राम! ये तो इतना प्यारा है। इसे नहीं काटने देंगे हम।" कन्चन ससुरजी के लौड़े को बड़े प्यार से सहलाती हुई बोली।
"तो फिर हमें कुछ और सोचना पड़ेगा।"
"हां पिताजी कुछ करिये ना। आपका ये तो बहुत परेशान कर रहा है।"
"ठीक है बहु, हम ही कुछ करते हैं।" ये कहते हुए रामलाल ने बहु के पेटिकोट का नाड़ा खींच दिया। नाड़ा खुलते ही पेटिकोट बहु की टांगों में गिर गया। दूसरे ही पल रामलाल ने बहु की बगलों में हाथ डाल के उसे ऊपर उठा लिया और खींच के अपनी बाहों में जकड़ लिया। इससे पहले की कन्चन की कुछ समझ में आता, उसने अपने आप को ससुर जी की छाती से चिपका पाया। वो सिर्फ़ ब्लाउज और पैंटी में थी। उसका पेटिकोट पीछे ज़मीन पे पड़ा हुआ था। ससुर जी का विशाल लंड उसकी टांगों के बीच ऐसे फंसा हुआ था जैसे वो उसकी सवारी कर रही हो।
"ऊई माआआ... पिताजीईईई..... ये आपने क्या किया? छोड़िये ना हमें।" कन्चन अपने आप को छुड़ाने का नाटक करती हुई बोली।
"तुम ही ने तो कहा था की हमारा लंड तुम्हें नज़दीक नहीं आने दे रहा है। देखो ना अब प्रोब्लम दूर हो गयी।"
"सच आप तो बड़े खराब हैं। अपनी बहु का पेटिकोट कोई ऐसे उतारता है?"
"मजबूरी थी बहु उतारना पड़ा। तुम्हारा पेटिकोट तुम्हें नज़दीक नहीं आने देता। लेकिन अब देखो ना तुम हमारे कितनी नज़दीक आ गयी हो।" रामलाल दोनों हाथों से बहु के विशाल चूतड़ों को दबा रहा था। बेचारी छोटी सी कच्छी मोटे मोटे चूतड़ों की दरार में घुसी जा रही थी। रामलाल के मोटे लौड़े ने बहु की कच्छी के कपड़े को सामने से भी उसकी चूत की दोनों फांकों के बीच में घुसेड़ दिया था। कन्चन को रामलाल के लंड की गर्माहट बेचैन कर रही थी। इतने दिनों से जिस लंड के सपने ले रही थी वो आज उसकी जांघों के बीच फंसा हुआ उसकी चूत से रगड़ खा रहा था।
"आय हाय! कितने मजबूर हैं आप जो आपको अपनी बहु का पेटिकोट उतारना पड़ा। लेकिन ऐसे चिपके हुए हम आपकी छाती की मालिश कैसे कर सकते हैं? छोड़िये ना हमें प्लीज़।"
"कोई बात नहीं बहु छाती पे नहीं तो पीठ पे तो मालिश कर सकती हो।" कन्चन ससुर जी के बदन से बेल लता की तरह लिपटी हुई थी। उसका सिर ससुर जी की छाती पे टिका हुआ था। उसने दोनों हाथों से पीठ की मालिश शुरु कर दी। रामलाल भी बहु की पीठ और चुतड़ों पे हाथ फेर रहा था। रामलाल के लौड़े से रगड़ खा के कन्चन की चूत बुरी तरह गीली हो गयी थी और पैंटी भी बिल्कुल उसके रस में भीग गयी थी। रामलाल के लंड का ऊपरी भाग बहु की चूत के रस में भीगा हुआ था। कन्चन का सारा बदन वासना की आग में जल रहा था।
"बहु तुम हमारी पीठ की मालिश करो, हम भी तुम्हारी पीठ की मालिश कर देते हैं।" रामलाल ने अपने हाथों में तेल ले कर बहु की पीठ पे मलना शुरु कर दिया। धीरे धीरे उसने बहु के विशाल नितम्बों पे से उसकी पैंटी को उनके बीच की दरार में सरका दिया और दोनों नितम्बों की दबा दबा के मालिश करने लगा। कन्चन के मुंह से हल्की हल्की सिसकियां निकल रही थी। पीठ पे मालिश करने के बहाने धीरे धीरे रामलाल ने बहु के ब्लाऊज के हुक खोल के ब्रा का हुक भी खोल दिया। कन्चन को महसूस तो हो रहा था की शायद ससुर जी उसके ब्लाउज और ब्रा का हुक खोल रहे हैं लेकिन वो अन्जान बनी रही।
जब ससुर जी ने उसका ब्लाउज और ब्रा को उतारना शुरु किया तो वो हड़बड़ा के बोली, "हाय राम!... पिताजी.. ये क्या कर रहे हैं? हमारा ब्लाउज क्यों उतार रहे हैं?" लेकिन कन्चन ने रामलाल से अलग होने की कोई कोशिश नहीं की।
"कहो तो बहु तुम्हारे ब्लाउज के ऊपर ही तेल लगा दें? बिना ब्लाउज उतारे तुम्हारी पीठ की कैसे मालिश होगी?" और इससे पहले की कन्चन कुछ बोलती रामलाल ने एक हाथ से बहु को अपने चिपका के रखा और दूसरे हाथ को ढीले हुए ब्रा के अन्दर डाल कर बहु की बड़ी बड़ी चूचिओं को मसलने लगा। कन्चन की चूचिओं पे मर्द का हाथ लगे दो महीने हो चुके थे। वो तो अब वासना आग में पागल हुई जा रही थी।
"इस्स्स....आआआआह...पिताजी......इस्स्स्स्स्स्स...ऐइइई...अआ..छोड़िये ना..अआह...धीरे...अब छोड़ दीजिये हमें...प्लीज़...आअआ...इआआह....इस्स्स्स्स धीरे....क्या कर रहे हैं?"
"कुछ नहीं बहु, तुम तो हमारी छाती पे मालिश कर नहीं सकी, हमनें सोचा हम ही अपनी बहु की छाती पे मालिश कर देते हैं।" बातों बातों में रामलाल ने बहु का ब्लाउज और ब्रा उसके बदन से अलग कर दिया। अब बहु के बदन पे सिर्फ़ एक छोटी सी कच्छी थी। रामलाल ने एक हाथ नीचे की ओर ले जा के बहु के चूत पे से उसकी कच्छी को साईड में कर दिया। अब रामलाल का लंड बहु की नंगी चूत से रगड़ रहा था।
"इस्स्स्स...हटिये भी पिताजी। आप तो सच मुच बहुत खराब हैं। अपनी जवान बहु को इस तरह कोई नंगी करता है? अब हमें कपड़े पहनने दीजिये।"
"बहु इसे कोई नंगी करना थोड़े ही कहते हैं। तुम्हें किसी मर्द ने नंगी करके चोदा जो नहीं है, इसीलिये नंगी होने का मतलब नहीं समझती हो। अभी तो तुम कच्छी पहने हुए हो।"
"हाय राम! तो अभी हमारी कच्छी भी उतारेंगे क्या?"
"हां बहु।"
"नहीं ना पिताजी...प्लीज़.. आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?"
"बहु, एक मर्द, औरत की कच्छी क्यों उतारता है?"
"जी वो... हमारा मतलब है...म्म्म्म...आआह"
"शर्माओ नहीं, बताओ तुम्हारा पति तुम्हारी कच्छी क्यों उतारता है?"
रामलाल बहु की चूचिआं मसल रहा था और उसका मोटा लम्बा लंड बहु की चूत की दोनों फांकों के बीच से होता हुआ पीछे की ओर दोनों नितम्बों के बीच में से झांक रहा था। कन्चन से अब और सहन नहीं हो रहा था। वो चाहती थी की ससुर जी अब जल्दी से जल्दी अपना गधे जैसा लौड़ा उसकी चूत में पेल दें। लेकिन एक तो औरत जात थी ऊपर से रिश्ता भी कुछ ऐसा था।
"बोलती क्यों नहीं बहु?"
"जी, वो तो हमें.. हमारा मतलब है.. वो तो हमें चोदने के लिये हमारी कच्छी उतारते हैं।" कन्चन दोनों हाथों से अपना मुंह छुपाते हुए बोली। पहली बार उसने ससुर जी के सामने चोदने जैसे शब्द का इस्तेमाल किया।
"लेकिन उस नालयक ने तुम्हें कभी नंगी करके नहीं चोदा ना?"
"नहीं पिताजी। लेकिन ये सब आप क्यों पूछ रहे हैं?"
"इसलिये बहु कि अब हम तुम्हारी कच्छी उतारके और तुम्हें पूरी तरह नंगी करके चोदेंगे। अब तुम्हें पता चलेगा की जब मर्द औरत को नंगी करके चोदता है तो औरत को कितना मज़ा आता है।"
"हाय राम! पिता जी.. हमें चोद के आपको पाप लगेगा।"
"इस लाजवाब जवानी को चोदने से अगर पाप लगता है तो लगे। अरे बहु अपने जिस्म की आवाज़ सुनो। अपनी चूत की आवाज़ सुनो। बताओ अगर तुम्हारी चूत को इस लंड की ज़रूरत नहीं है तो उसने हमारे लंड को गीला क्यों कर दिया है?"
"आप अपने गधे जैसे उसको हमारे वहां रगड़ेंगे तो हमारी चूत गीली नहीं होगी क्या?"
"अब इतना गीला कर ही दिया है तो उसे अपनी प्यारी खूबसूरत सी चूत का रस भी पी लेने दो।"
लोहा गरम था। रामलाल ने अब देर करना ठीक नहीं समझा। बस एक बार किसी तरह बहु की चूत में लंड फंसा ले, फिर सब ठीक हो जाएगा। उसने एक झटके में बहु की चूत के रस में सनी हुई पैंटी पकड़ के नीचे खिसका दी। अब कन्चन बिल्कुल नंगी थी।
रामलाल ने बहु को अपनी बाहों में जकड़ लिया और अपने होंठ बहु के रसीले होंठों पे रख दिये। कन्चन भी ससुर जी से लिपटी हुई थी। उसकी चूत बुरी तरह गिली थी। चूत के रस में सनी पैंटी उसके पैरों में पड़ी हुई थी। कन्चन ने पैरों पे उचक के रामलाल के तने हुए लंड को अपनी टांगों के बीच में इस तरह स्थापित किया कि वो उसकी चूत पे ठीक से रगड़ सके। रामलाल बहु की चूत की गर्मी अपने लौड़े पर और कन्चन ससुर जी के विशाल लंड की गर्मी अपनी चूत पे महसूस कर रही थी। काफ़ी देर बहु के होंठों का रसपान करने के बाद रामलाल कन्चन से अलग हो गया और थोड़ी दूर से उसकी मस्त जवानी को निहारने लगा। क्या बला की खूबसूरत थी बहु। गोरी गोरी मांसल चूचिआं। पतली कमर और उसके नीचे फैलते हुए विशाल चूतड़। तराशी हुई मांसल जांघों के बीच में घने काले बाल। रामलाल ने आज तक किसी औरत की चूत पे इतने घने और लम्बे बाल नहीं देखे थे। ऐसी जवानी देख के रामलाल मदहोश हो गया।
"ऊफ.. पिता जी अपनी बहु को नंगी करते आपको ज़रा भी शरम नहीं आई। अब ऐसे घूर घूर के क्या देख रहे हैं?"कन्चन शर्मा कर एक हाथ से अपनी चूत और एक हाथ से अपनी चूचिओं को ढकने की नाकामयाब कोशिश करती हुई बोली।
"सच बहु आज तक हमनें इतनी मस्त जवानी नहीं देखी। इस बेचारे लंड को निराश ना करो, थोड़ा सा तो अपनी चूत का रस पिला दो। चलो अगर तुम हमें नहीं देना चाहती हो तो कोई बात नहीं, हम सिर्फ़ लंड का सुपाड़ा तुम्हारी चूत में डाल के निकाल लेंगे। बेचारा थोड़ा सा पानी पी लेगा। अब तो ठीक है ना?"
"ठीक है पिताजी। हमें चोदेंगे तो नहीं ना?" कन्चन जान के चोदने जैसे शब्द का इस्तेमाल कर रही थी। उसके मुंह से ये सुन के रामलाल और भी पागल हुआ जा रहा था।
"नहीं चोदेंगे बहु। तुम्हारी इज़ाज़त के बिना तुम्हें कैसे चोद सकते हैं।"
ये कहते हुए रामलाल ने नंगी कन्चन को अपनी बलिश्ठ बाहों में उठा लिया और बिस्तर पे पटक दिया। अब वो पागलों की तरह बहु के पूरे बदन को चूमने लगा। फिर उसने बहु की मोटी जांघें फैला दी। बहु के जांघों के बीच का नज़ारा देख के उसका कलेजा मुंह को आ गया। घनी लम्बी झांटों के बीच में से बहु की चूत के खुले हुए होंठ झांक रहे थे मानों बर्सों से प्यासे हों। नंगी कन्चन अपने ससुर के सामने टांगें फैलाये पड़ी हुई थी। शर्म के मारे उसने दोनों हाथों से अपना मुंह ढक लिया।
"ऐसे क्या देख रहे हैं पिताजी...?"
"हमें भी तो इस जन्नत का नज़ारा देखने दो बहु। बहु तुमने तो टांगों के बीच में पूरा जंगल उगा रखा है। कभी साफ़ नहीं किया? इतनी खूबसूरत चूत को यों घने बालों के पीछे क्यों छुपा रखा है?"
"इसलिये कि कहीं आपकी नज़र ना लग जाए।"
"आए हाय! बहु तुम्हारी इसी अदा ने तो हमें मार डाला है।"
अब रामलाल से ना रहा गया। उसने बहु की मादक चूत को आगे झुक के चूम लिया। धीरे धीरे वो उसकी चूत चाटने लगा। कन्चन के मुंह से अब सिसकारियां निकल रही थी।
इस्स्स..आअआआआअह....इइइइइस्स्स्स्स....उउंहह। रामलाल की जीभ बहु की चूत के अन्दर बाहर हो रही थी। ऊऊप्फ....आआआह....पिताआआजी...आह...आइइइइई। बहु की चूत बुरी तरह रस छोड़ रही थी। उसकी लम्बी लम्बी झांटें भी भीग गयी थी। बहु वासना की आग में उत्तेजित हो के, चूतड़ उचका उचका के अपनी चूत ससुर जी के मुंह पे रगड़ रही थी। रामलाल का पूरा मुंह बहु की चूत के रस में सन गया। चूत के बाल रामलाल के मुंह में जा रहे थे। अब बहु को चोदने का टाईम आ गया था। रामलाल ने बहु के टांगें मोड़ के उसकी छाती से लगा दी। बहु की चूत उभर आयी थी और मुंह फाड़े लंड का इन्तज़ार कर रही थी। रामलाल ने अपने फौलादी लंड का सुपाड़ा बहु की खुली हुई चूत के मुंह पे टिका दिया और धीरे धीरे दोनों फांकों के बीच में रगड़ने लगा। कन्चन से अब और सहन नहीं हो रहा था।
"इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स.... पिताजी क्यों तंग कर रहे हैं? आपका वो तो हमारी उसका रस पीना चाहता है ना। अब डाल भी दीजिये अन्दर"। कन्चन का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था। जिस लंड के वो रात दिन सपने देखती थी अब उसका मोटा सुपाड़ा कन्चन की चूत के दरवाज़े पे दस्तक दे रहा था।
"बहु तुम्हारी चूत तो बिल्कुल डबल रोटी की तरह फूली हुई है।"
"आपको अच्छी लगी?"
"बहुत।"
"तो फिर ले लीजिये ना..अब डालिये ना प्लीज़..." कन्चन अपने चूतड़ उचका के लंड अपनी चूत में लेने की कोशिश करते हुए बोली। रामलाल ने लंड के सुपाड़े को बहु की चूत की दोनों फांकों के बीच के कटाव में थोड़ा और रगड़ा और फिर हल्का सा धक्का लगा दिया। चूत इतनी गीली थी कि लंड का मोटा सुपाड़ा गुप्प से अन्दर घुस गया।
"आऐइइइई.......आआह पिता जी.....आआह......आअआपका तो बहुत.....आआ मोटाआआआआ है। मैं मर जाउंगी।"
"कुछ नही होगा बहु।" रामलाल ने बहु की चूचिआं मसलते हुए इस बार एक करारा सा धक्का लगा के एक चौथाई लंड अन्दर कर दिया।
"ऊई...माआं...आआअह....आआआइइइइइइई इइइइइइइइइइइइइई........ आआहहहह। पिताजी आप तो आह... हमें चोद रहे हैं। इस्स्स्स..."
"अच्छा नहीं लग रहा तो निकाल लें बहु।"
"बहुत अच्छा लग रहा है...आअआह.......ऊऊह....आपने तो कहा था की आप चोदेंगे नहीं।"
"कहां चोद रहें हैं बहु? इसे सिर्फ़ तुम्हारी चूत का रस पिला दें। बिना चूत में जाए ये रस कैसे पियेगा?"
रामलाल ने लंड को सुपाड़े तक बाहर खींचा और फिर एक ज़बर्दस्त धक्का लगा दिया। इस बार करीब ८ इन्च लंड बहु की चूत में समा गया। कन्चन का दर्द के मारे बुरा हाल था।
"आआआआआआआआआ.................प्लीईईईईईईईईईईज....आआआह. आह.आह...आह ।आह आपका तो बहुत लम्बा है पिताजी। आइइअआह..... हम नहीं झेल पाएंगे। अआ.....आह.....अभी और कितना बाकी है? आह।"
"बस बहु अब तो बहुत थोड़ा सा ही बाहर है।"
"जी हमारी तो फट जाएगी।"
"नहीं फटेगी बहु। तुम तो ऐसे कर रही हो जैसे ज़िन्दगी में पहली बार लंड तुम्हारी चूत में गया हो।"
"जी मर्द का तो कई बार गया है...आआआह......... लेकिन गधे का तो आज पहली बार जा रहा है....मम्मी...आआआआह"
"बस बहु थोड़ा सा और झेल लो। उसके बाद तो हम निकाल ही लेंगे।"
यह कह कर रामलाल ने बहु की चूत के रस में सना हुआ लंड पूरा बाहर खींच लिया और उसकी मोटी मोटी चूचिआं पकड़ के एक बहुत ही ज़ोर का धक्का लगा दिया। इस बार रामलाल का ११ इन्च का मूसल बहु की चूत को बड़ी बेरहमी से चीरता हुआ पूरा जड़ तक अन्दर समा गया। रामलाल के सांड जैसे बड़े बड़े टट्टे बहु के ऊपर की ओर उठे हुए विशाल चूतड़ों से चिपक गये और गांड के छेद में गुद गुदी करने लगे।
"आआआइइइइइइइई......आअह...आअह... पिताजीईईईई........इस्स्स्स्स......मर गयी मैं.. ऊह, सचमुच फट जाएगी हमारी। प्लीज़ हमें छोड़ दीजिये। आपका तो किसी गधी के लिये ही ठीक है।"
"मेरी जान, अब इतना क्यों चिल्ला रही हो? तुम्हारी चूत ने तो हमारा पूरा लंड खा लिया है।"
"जी इतनी बेरहमी से आपने अन्दर जो पेल दिया। इइइस्स्स्स्स्स्स्स...."
रामलाल ने हल्के हल्के धक्के लगाने शुरु कर दिये। कन्चन बिल्कुल मस्त हो गयी थी।
"आआअह्ह्ह... इस्स्स्स्स.....उआआआह....पिताजी...आअह आप तो हमें सचमुच ही चोदने लग गये।"
"कहो तो ना चोदें बहु।"
"सच आप बहुत ही खराब हैं। औरत को फुसला के चोदना तो कोई आपसे सीखे। अपना गधे जैसा वो पूरा हमारे अन्दर पेल दिया, और अब कह रहे हैं, कहो तो ना चोदें। इसे चोदना नहीं तो और क्या कहते हैं?"
"तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा बहु?" रामलाल आधा लंड बाहर निकाल के फिर जड़ तक पेलता हुआ बोला।
"आआई...इस्स्स्स। जी बहुत अच्छा लग रहा है। काश आप हमारे ससुर ना होते ! तो हम आज जी भर के आपसे चुदवाते॥"
"देखो बहु तुम्हें मज़ा आ रहा है और हमने भी ऐसी जवान और खूबसूरत औरत को कभी नहीं चोदा। सिर्फ़ आज चोद लेने दो।"
"सच आप बहुत चालाक हैं। अभी थोड़ी देर पहले आपने हमें बेटी कहा था, औरा अब अपनी बेटी को ही चोद रहे हैं? बोलिये अब भी हम आपकी बेटी हैं ? "
"हां बेटी , तुम अब भी हमारी बेटी हो और हमेशा हमारी बेटी रहोगी।" रामलाल एक ज़ोर का धक्का मारता हुआ बोला।
"आआआह। ।अच्छाआआआ जी! अपनी बेटी को चोदते हुए आपको ज़रा भी शरम नही आ रही? लेकिन पिताजी आपका बहुत मोटा है। हमारी उसको चौड़ी कर देगा। चौड़ी हो गयी तो इन्हें पता लग जाएगा। हम कहीं के नहीं रहेंगे।"
"किसको चौड़ी कर देगा बहु?"
"हटिये भी आपको पता तो है। हमारी जिस चीज़ में ये मूसल घुसा हुआ है उसी को तो चौड़ी करेगा ना।" कन्चन रामलाल के लौड़े को अपनी चूत से दबाती हुई बोली।
"कितनी नादान हो बहु, इतनी जल्दी थोड़े ही चौड़ी हो जाती है। अगर हम तुम्हें दो तीन साल चोदें तो शायद चौड़ी हो जाए।"
"फिर ठीक है, अब तो आपने चोदना शुरु कर ही दिया है तो आज चोद लीजिये। लेकिन आज के बाद फिर कभी नहीं चोदने देंगे। ये पाप है। इन्होनें पूछा चौड़ी कैसे हो गयी तो कह देंगे खेत में जाते वक्त एक गधे ने हमें ज़बर्दस्ती चोद दिया। वैसे ये बात झूठ तो है नहीं। इस वक्त हमें एक गधा ही तो चोद रहा है। "
"सच बहु तुम बातें बहुत मीठी मीठी करती हो॥ आज तो जी भर के चोद लेने दो। ऐसी चूत चोद के तो हम धन्य हो जाएंगे। लेकिन बहु तुम्हें चुदाई सिखाना भी हमारा धर्म है। बोलो सीखोगी न?"
"जी, आप सिखाइये, हम ज़रूर सिखेंगे।"
"देखो बहु चुदवाते वक्त औरत को कोई शरम नहीं करानी चाहिये। बस खुल के रंडी की तरह चुदवाओ।"
"हुमें क्या पता रंडिआं कैसे चुदवाती हैं।"
"बहु रंडिआं चुदवाते वक्त कोई शरम नहीं करती और ना ही अपनी जुबान पे काबू रखती हैं। रंडी सिर्फ़ एक औरत की तरह चुदवाती हई, मर्द से पूरा मज़ा लेती है और मर्द को पूरा मज़ा देती है। बोलो बहु चोदें तुम्हें रंडी की तरह?"
"आअआ...जी, चोदिये हमें बिल्कुल रंडी बना के चोदिये। इइइइइस्स्स्स्स.... आज ये चूत आपकी है।" कन्चन ने अब शर्माने का नाटक बन्द कर दिया और बेशर्मी के साथ चोदने की बातें करने लगी।
"शबाश बहु! ये हुई ना बात, आज हम तुम्हारी चूत की प्यास बुझा के ही दम लेंगे। तब तक चोदेंगे जब तक तुम्हारा दिल नहीं भर जाता।"
"जी हम कब मना कर रहे हैं। चोदिये ना।"कन्चन चूतड़ उचकाती हुई बोली अब रामलाल बहु के नंगे बदन को और मांसल जांघों को सहलाने लगा। धीरे धीरे कन्चन का दर्द दूर होता जा रहा था और उसकी चूत ने फिर से पानी छोड़ना शुरु कर दिया था। रामलाल बहु के रसीले होंठों को चूसने लगा और धीरे धीरे अपना लंड बहु की चूत के अन्दर बाहर करने लगा। कन्चन को अब बहुत मज़ा आ रहा था। गधे जैसे लंड से चुदवाने में औरत को कैसा आनंद मिलता है आज उसे पता चला। रामलाल के मोटे लौड़े ने कन्चन की चूत बुरी तरह चौड़ी कर रखी थी।
"दर्द हो रहा हो तो बाहर निकाल लें बहु?"
"नहीं नहीं पिता जी हमारी चिन्ता ना किजिये बस हमें इतना चोदिये कि आपके लंड की बर्सों की प्यास शान्त हो जाए। आपके लंड की प्यास शान्त हो जाए तो हमें बहुत खुशी होगी।" कन्चन चूतड़ उचका के रामलाल का लौड़ा गुप्प से अपनी चूत में लेती हुई बोली। रामलाल ने बहु की टांगों को और चौड़ा किया और हल्के हल्के धक्के लगने लगा। वो नहीं चाहता था की उसका मूसल बहु की नाज़ुक चूत को फाड़ दे। एक बार बहु की चूत को उसके लम्बे मोटे लौड़े को झेलने की आदत पर जाए फिर तो वो खूब जम के चोदेगा। कन्चन ने ससुरजी की कमर में टांगें लपेट ली और अपने पैर की एड़िओं से उनके चूतड़ को धक्का देने लगी। रामलाल समझ गया की बहु की चूत अब चुदाई के लिये पूरी तरह तैयार है। अब उसने बहु की चूचिआं पकड़ के लंड को सुपाड़े तक बाहर निकाल के जड़ तक अन्दर पेलना शुरु कर दिया। बहु की चूत इतनी ज़्यादा गीली थी की पूरे कमरे में बहु की चूत से फच...फच...फच...फच...फच...फच...फच....फच.....और मुंह से आअआह... इइस्स्स्स..... आऐइइई.... आआह्ह्ह्ह.... आआआअआ.... उइइइइइइई.. आह्ह्ह.... आह.... आह.... आह.... आह का मादक संगीत निकल रहा था।
"बहु ये फच....फच.... की आवाज़ें कहां से आ रही हैं?" रामलाल बहु को चिढ़ाता हुआ बोला।
"इस्स....अआह....पिताजी ये तो अपने मूसल से पूछिये।"
"उस बेचारे को क्या पता बहु?"
"उसे नहीं तो किसे पता होगा पिताजी। इस्स्स....ज़ालिम कितनी बेरहमी से हमारी चूत को मार रहा है।"
"तुम्हारी चूत भी तो बहुत ज़ालिम है बहु। कितने दिनों से हमारी नींद हराम कर रखी थी। ऐसी चूत को चोदने में रहम कैसा? सच इसे तो आज हम फाड़ डालेंगे।" रामलाल ज़ोर ज़ोर से धक्के मारता हुआ बोला।
"हाय ! पिताजी, हमने कब कहा रहम कीजिये। औरत की चूत के साथ ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक ही बार रहम किया जाता है और वो भी अगर चूत कुंवारी हो। उसके बाद अगर रहम किया तो फिर चूत दूसरा लंड ढुंढने लगती है। औरत की चूत तो बेरहमी से ही चोदी जाती है। अगर हमारी चूत ने आपको इतना तंग किया है तो फाड़ डालिये ना इसे। कौन रोक रहा है?"
कन्चन तो अब बिल्कुल रंडिओं की तरह बातें कर रही थी और हर धक्के का जबाब अपने चूतड़ ऊपर उचका के दे रही थी। अब तो ससुर और बहु के अंगों का मिलन हवा में हो रहा था। ससुर जी के धक्के से आधा लंड बहु की चूत में जाता और बहु के धक्के से बाकी बचा हुआ लंड जड़ तक बहु की प्यासी चूत में घुस जाता। कन्चन ने शर्म हया बिल्कुल छोड़ दी थी और खुल के चुदवा रही थी। फच.... फच....फच.... फच.... अआ....आआह। ..इइइइस्स्स्स.........ऊऊइइइमआं ...फच...फच....... बहु की चूत से इतना रस निकल रहा था कि उसकी घनी झांटें भी चूत के रस से चिपचिपा गयी थी। ससुर जी का मूसल जब जड़ तक बहु रानी की चूत में जाता और जब बहु और ससुर की झांटों का मिलन हो जाता तो ससुर जी की झांटें भी बहु की चूत के रस में गीली हो जाती। अब रामलाल पूरा ११ इन्च का लंड बाहर निकाल कर जड़ तक बहु की चूत में पेल रहा था। कन्चन ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि इस उम्र में भी ससुर जी का लंड अपने दोनों बेटों से ज़्यादा तगड़ा और सख्त होगा और उसकी जवान चूत की ये हालत कर देगा। उसकी चूत के चारों तरफ़ चूत के रस में सनी झांटों का जंगल तो मानो एक दलदल बन गया था। कन्चन समझ गयी की ससुर जी चुदाई की कला में बहुत माहिर थे। हों भी क्यों ना। ना जाने कितनी लड़किओं को चोद चुके थे। अब कन्चन से रहा नहीं गया और उसने ससुर जी से पूछ ही लिया,
"आआहह......इस्स्स......आ....पिता जी, सच सच बताइये, आज तक आपने कितनी लड़किओं को चोदा है?"
"क्यों बहु तुम ये क्यों पूछ रही हो?" रामलाल बहु के विशाल चूतड़ों को सहलाता हुआ बोला।
"आप जिस तरह हमें चोद रहे हैं वैसे तो कोई काम कला में माहिर आदमी ही चोद सकता है। और अगर आपने ज़िन्दगी में सिर्फ़ सासु मां को ही चोदा होता तो आप काम कला में इतने माहिर नहीं हो सकते थे।"
"क्यों बहुत मज़ा आ रहा है बहु?"
"जी बहुत! आज तक किसी मर्द ने हमें ऐसे नहीं चोदा।"
"कितने मर्दों से चुदवा चुकी हो बहु?"
"धत! आप तो बड़े वो हैं पिताजी। बताइये ना प्लीज़। कितनी औरतों को चोद चुके हैं?"
रामलाल बहु के रसीले होंठों को चूमता हुआ बोला, "देखो बहु, तुम्हारी सासु मां तो अपनी चूत देती नहीं थी। हमारी जवानी भी वैसे ही बर्बाद हो रही थी जैसे तुम्हारी जवानी बर्बाद हो रही है। हमें लाचार हो कर अपने बदन की प्यास बुझाने के लिये खेतों में काम करने वाली औरतों का सहारा लेना पड़ा।"
"हाय....तो आपने खेतों में काम करने वाली औरतों को चोदा? कितनों को चोदा?" कन्चन ज़ोर से चूतड़ उचका के ससुर जी का लंड अपनी चूत में पेलते हुए बोली।
"ये ही कोई बीस औरतों को।"
"हाय राम! बीस को! उनमें से कुन्वारी कितनी थी?"
"बहु लड़की कुन्वारी हो तो इसका मतलब ये नहीं की उसकी चूत भी कुन्वारी है।"
"जी हमारा मतलब है उनमे से कितनों की चूत कुन्वारी थी।"
"तीन की।"
"सच, फाड़ ही डाली होगी आपके इस मूसल ने।"
"नहीं बहु ऐसा नहीं है। तुम्हारी सासु मां की जो हालत हुई थी उसके बाद से हम बहुत सम्भल गये थे। लेकिन फिर भी बहुत खून खराबा हो गया था। बेचारी थी भी १७ या १८ साल की। इतना ध्यान से चोदने के बाद भी तीनों ही बेहोश हो गयी थी।"
"उसके बाद से तो उन्होनें आपसे कभी नहीं चुदवायी होगी।"
"नहीं बहु उनमें से एक ही ऐसी थी जिसे हमने अगले चार साल तक खूब चोदा।"
"कौन थी वो पिताजी?" कन्चन जानते हुए भी अन्जान बन रही थी।
"देखो बहु ये राज़ हम आज सिर्फ़ तुम ही को बता रहे हैं। वो हमारी साली यानी तुम्हारी सासु मां की सगी बहन थी।"
"हाय राम! पिताजी आपने अपनी साली तक को नहीं छोड़ा? चार साल में तो चौड़ी हो गयी होगी उसकी चूत।" कन्चन अपनी चूत से रामलाल का लंड दबाते हुए बोली।
"उसे तो सिर्फ़ चार साल चोदा था बहु, लेकिन अगर तुम चाहोगी तो हम तुम्हें ज़िन्दगी भर चोद सकते हैं। अपनी जवानी बर्बाद ना करो"
"बर्बाद क्यों होगी हमारी जवानी। अब आपके हवाले जो कर दी है। ज़िन्दगी भर चोद के तो आप का ये गधे जैसा मूसल हमारी चूत को कुआं बना देगा।" कन्चन बेशर्मी से चूतड़ उचकती हुई बोली। ससुर जी को बहु को चोदते अब करीब एक घन्टा हो चला था। कन्चन के पसीने छूत गये थे लेकिन रामलाल झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।
अचानक रामलाल बहु की चूत से लंड बाहर निकालता हुआ बोला, "बहु अब हम तुम्हें एक दूसरी मुद्रा में चोदेंगे।"
"वो कैसे पिताजी?"कन्चन रामलाल के मोटे, काले, चूत के रस में चमकते हुए लंड का भयन्कर रूप देख के कांप उठी।
"तुमने कुत्ते और कुतिआ को तो चुदाई करते देखा है?"
"जी..."
"बुस कुतिआ बन जाओ। हम तुम्हारी चूत कुत्ते की तरह पीछे से चोदेंगे।"
"हाय राम! पिता जी...! अपनी बहु को पहले रंडी और अब कुतिआ भी बन डाला।"
"कभी कुतिआ बन के चुदवाई हो बहु?"
"इन्होनें तो हमें औरत की तरह भी नहीं चोदा, कुतिआ बनाना तो दूर की बात है। लेकिन आज हम आपकी कुतिआ ज़रूर बनेंगे।" ये कह कर कन्चन कुतिआ बन गयी। उसने अपनी छाती बिस्तर पे टिका दी और घुटनों के बल हो कर टांगें चौड़ी कर ली और बड़े ही मादक ढंग से अपने विशाल चूतड़ों को ऊपर की ओर उचका दिया। इस मुद्रा में बहु के विशाल चूतड़ों और मांसल जांघों के बीच में से घनी झांटों के बीच बहु की फूली हुई चूत साफ़ नज़र आ रही थी। रामलाल के मोटे लंड की चुदाई के कारण चूत का मुंह खुल गया था और बहुत ही सूजी हुई सी लग रही थी। बहु के गोरे गोरे मोटे मोटे चूतड़ और उनके बीच से झांकता गुलाबी छेद देख कर तो रामलाल के मुंह में पानी आ गया। रामलाल से ना रहा गया। उसने अपने मूसल का सुपाड़ा बहु की चूत के खुले हुए मुंह पे टिका दिया और एक ज़बर्दस्त धक्का लगा दिया। चूत इतनी गीली थी कि एक ही धक्के में ११ इन्च लम्बा लंड जड़ तक बहु की चूत में समा गया।
"आआआआह्ह्ह्ह्ह.....उइइइइइइई माआआआआ...... हाय राम..पिता जी..... मार डाला। इस्स्स्स्स्स्स............कुत्ते भी इतने ही बेरहम होते हैं क्या?"
"हां मेरी जान, तभी तो कुतिआ को मज़ा आता है।"
रामलाल ने अब बहु के चूतड़ पकड़ के ज़ोर ज़ोर से धक्के मारना शुरु कर दिया था। बहु भी चूतड़ उचका उचका के ससुरजी के धक्कों का जबाब दे रही थी। इस मुद्रा में बहु के मुहं और चूत दोनों ही और भी ज़्यादा आवाज़ कर रहे थे। बहु अपने चूतड़ पीछे की ओर उचका उचका के ससुर जी के लंड का स्वागत कर रही थी। बहु की चूत का रस अब रामलाल के सांड की तरह लटकते टट्टों को पूरी तरह गीला कर चुका था। कन्चन अब तक दो बार झड़ चुकी थी लेकिन रामलाल झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।
कन्चन ने अपने चूतड़ ज़ोर से पीछे की ओर उचका के रामलाल का मूसल जड़ तक अपनी चूत में पेलते हुए पूछा, "पिताजी आप हमें कुतिआ बना के चोद रहे हैं, कहीं चुदाई के बाद कुत्ते की तरह आपका लंड हमारी चूत में तो नहीं फंसा रह जाएगा?"
"फंसा रह भी गया तो क्या हो जाएगा बहु?"
"हमें तो कुछ नहीं पिताजी, लेकिन जब सासु मां शाम को वापस आके आपको हमारे ऊपर कुत्ते की तरह चढ़ा हुआ देखेंगी और आपका मूसल हमारी चूत में फंसा हुआ देखेंगी तो आपके पास क्या जवाब होगा?"
"कह देंगे की एक कुत्ता तुम्हारी बहु को चोदने की कोशिश कर रहा था। इससे पहले की वो तुम्हारी बहु की चूत में अपना लंड पेलता, उस कुत्ते से बचाने के लिये हमें अपना लंड बहु की चूत में पेलना पड़ा। आखिर जो कुछ किया बहु को बचाने के लिये ही तो किया।"
"अच्छा जी! और अगर वो पूछें की बहु नंगी कैसे हो गयी तो?"
"तो क्या? कह देंगे बहु नहाने जा रही थी कि एक बहुत बड़ा कुत्ता बहु को नंगी देख के खिड़की से खूद के अन्दर आ गया और उसे गिरा के उसके ऊपर चढ़ कर चोदने की कोशिश करने लगा।"
"और वो पूछें की आपको अपना लंड हमारी चूत में पेलने की क्या ज़रूरत थी, तो?"
"अरे भई ये तो बहुत सिम्पल बात है। अगर बहु की चूत में लंड पेल के हमने बहु का छेद बन्द ना किया होता तो वो कुत्ता उस छेद में अपना लंड पेल देता। हमने तो सिर्फ़ अपने घर की इज़्ज़त बचा ली।"
"हां... आपके पास तो सब चीज़ों का जबाब है।" कन्चन अपने चूतड़ उचका के रामलाल का पूरा लंड अपनी चूत में लेती हुई बोली।
अब रामलाल ने कन्चन के चूतड़ पकड़ के ज़ोर ज़ोर से धक्के मारना शुरु कर दिया। उसने बहु के गोरे गोरे चूतड़ों को दोनों हाथों में पकड़ के फैला दिया था ताकि उनके बीच में गुलाबी रंग के छोटे से छेद के दर्शन कर सके। आखिर बहु के इन विशाल चूतड़ों ने ही तो उसकी नींद हराम कर रखी थी। बहु का गुलाबी छेद देख कर उसके मुहं में पानी आ रहा था। उसका मन कर रहा था की नीचे झुक के उस गुलाबी छेद को चूम ले। रामलाल जानता था कि यहां बहु की गांड मारना खतरे से खाली नहीं था। बहु का चिल्लाना सुन के पूरा मुहल्ला जमा हो सकता था। अगर उसका मूसल नहीं झेल पायी और बेहोश हो गयी तुब तो और भी मुसीबत हो जाएगी। लेकिन उसने सोच लिया था कि वो बहु को खेतों में ले जा के उसकी गांड ज़रूर मारेगा।
उधर कन्चन बड़ी अच्छी तरह समझ रही थी कि जिस तरह ससुर जी ने उसके चूतड़ों को फैला रखा था, उन्हें उसकी गांड के दर्शन हो रहे होंगे। उसके सेक्सी चूतड़ों को देख के मर्द के दिल में क्या होता है वो भी वो अच्छी तरह जानती थी। वो मन ही मन सोच रही थी कि ससुर जी कभी ना कभी तो उसकी गांड ज़रूर मारेंगे। इतना मोटा और लम्बा मूसल तो उसकी गांड फाड़ ही डालेगा। रामलाल से अब और नहीं रहा गया। उसने अपना ११ इन्च का लंड बहु की चूत से बाहर खींच लिया और नीचे झुक के अपना मुंह बहु के फैले हुए विशाल चूतड़ों के बीच में दे दिया। रामलाल पागलों की तरह बहु की गांड के गुलाबी छेद को चाटने लगा और अपनी जीभ कभी कभी छेद के अन्दर घुसेड़ देता।
"इस्स्स्स.........आआआह.......आआअहहहह.........इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स पिता जी ये आप क्या कर रहे हैं? वहां तो गंदा होता है।"
"चुदाई के खेल में कुछ गंदा नहीं होता । तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा बहु?"
"जी अच्छा तो बहुत लग रहा है, लेकिन...."
"लेकिन क्या? मज़ा तो आ रहा है ना? सच तुम्हारी गांड बहुत ही स्वादिष्ट है।"
"हटिये भी पिताजी, वो कैसे स्वादिष्ट हो सकती है? वहां से तो..."
"हमें पता है बहु वहां से तुम क्या करती हो। आज तक इस छेद से तुमने सिर्फ़ बाहर निकालने का काम किया है, कुछ अन्दर नहीं लिया।"
"हाय राम! उस छेद से अन्दर क्या लिया जाता है?"
"बहु जब ये लंड तुम्हारे पीछे वाले छेद में जाएगा तुब देखना कितना मज़ा आएगा।"
"हाय राम! पीछे वाले छेद में भी लंड डाला जाता है क्या?" कन्चन बनती हुई बोली।
"हां बहु, औरत के तीन छेद होते हैं और तीनों ही चोदे जाते हैं। औरत की सिर्फ़ चूत ही नहीं गांड भी मारी जाती है। औरत को मर्द का लंड भी चूसना चहिये। जिस औरत के तीनों छेदों में मर्द का लंड ना गया हो वो अपनी जवानी का सिर्फ़ आधा ही मज़ा ले पाती है।"
"बाप रे ! ये गधे जैसा लंड उस छोटे से छेद में कैसे जा सकता है? सच ये तो हमारे छेद को फाड़ ही डालेगा। ना बाबा ना हमें नहीं लेना ऐसा मज़ा।"
"अरे बहु इतना घबराती क्यों हो? हम तो सिर्फ़ तुम्हारे इस गुलाबी छेद को प्यार कर रहे हैं, तुम्हारी गांड तो नहीं मार रहे।"
"आअहह बहुत मज़ा आ रहा है। आअह...आआइइइइई... जीभ अन्दर डाल दीजिये, प्लीज़....."
रामलाल बड़ी तेज़ी से अपनी जीभ बहु की गांड के अन्दर बाहर कर रहा था और उस गुलाबी छेद के चारों ओर चाट रहा था। कन्चन अब और नहीं सह पायी और एक बार फिर झड़ गयी।
"पिता जी हम तो अब तक तीन बार झड़ चुके हैं और आप हैं की झड़ने का नाम ही नहीं ले रहे। अब प्लीज़ हमें चोदिये और हमारी प्यासी चूत को अपने वीर्य से भर दीजिये।"
"ठीक है बहु जैसा तुम चाहो। आज पहले तुम्हारी प्यासी चूत को तृप्त कर दें। बाद में तो तुम्हें काम कला के कई गुर सिखाने हैं।"
"ठीक है गुरु जी! अब तो प्लीज़ हमारी चूत चोदिये और इसकी बरसों की प्यास बुझा दीजिये। हम कहीं भाग तो रहे नहीं, रोज़ आप से चुदाई के नये नये तरीके सीखेंगे।"
रामलाल ने बहु की गांड में से अपनी जीभ निकाली और फिर से अपने लंड का सुपाड़ा कुतिआ बनी बहु की फूली हुई चूत पे टिका दिया और एक ही धक्के में फच की आवाज़ के साथ जड़ तक पेल दिया। अब रामलाल बहु के दोनों चूतड़ों को पकड़ के ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा। करीब बीस मिनट तक बहु की चूत की अपने मूसल से पिटाई करने के बाद बरसों से अपने बाल्स में इकट्ठा किया हुआ वीर्य बहु की चूत में उड़ेल दिया। बहु को तो जैसे नशा सा आ रहा था। उसकी चूत ससुर जी के गरमा गरम वीर्य से लबालब भरी गयी थी और अब तो वीर्य चूत में से निकल कर बिस्तर पे भी टपक रहा था। रामलाल ने बहु की चूत में से अपना मूसल बाहर खींचा और बहु के बगल में लेट गया। बहु भी निढाल हो के बिस्तर पे लुढ़क गयी थी। तीन घन्टे से चल रही इस भयन्कर चुदाई से उसके अंग अंग में मीठा मीठा दर्द हो रहा था।
रामलाल ने बहु से पूछा, "बहु, कुछ शान्ति मिली?"
"जी, आज तो तृप्त हो गयी।"
"चलो उठो, तुम्हारी सासु मां के आने का टाईम हो रहा है। नहा धो लो, कहीं उन्हें शक ना हो जाए।"
"जी ठीक है।"
कन्चन बिस्तर से उठी और गिरते गिरते बची। वीर्य उसकी चूत से निकल के जांघों पे बह रहा था। उसकी टांगें कांप रही थी। रामलाल ने जल्दी से उठ के बहु को सहारा दिया। बहु तो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। रामलाल बहु को ले के बाथरूम में गया और उसे एक स्टूल पे बैठा दिया। उसके बाद उसने बहु की टांगें फैला दी और पानी से चूत की सफ़ाई करने लगा। बहु की घनी झांटें ससुर के वीर्य में सनी हुई थी। कन्चन को अपनी सुहाग रात याद आ गयी जब इसी तरह उसके पति ने उसकी चूत की सफ़ाई की थी। आज वही काम ससुर जी कर रहे थे। फर्क सिर्फ़ इतना था कि सुहाग रात को उसकी कुंवारी चूत की दुर्दशा हुई थी और आज ससुर जी के मूसल ने उसकी कई बार चुदी हुई चूत की भी वैसी ही दुर्दशा कर दी जैसी सुहाग रात को हुई थी। चूत साफ़ करने के बाद ससुरजी ने कन्चन के ऊपर पानी डाल के उसे नहलाना शुरु कर दिया। ठन्डा ठन्डा पानी पड़ने से कन्चन के शरीर में जान आई। कन्चन ने भी ससुर जी के लंड को पानी से साफ़ किया जो उसकी चूत के रस में बुरी तरह सना हुआ था। इस तरह बहु और ससुर ने एक दूसरे को नहलाया।
रामलाल ने उसके बाद कन्चन को कहा, "बहु जाओ सासु मां के आने से पहले थोड़ा आराम कर लो।"
"ठीक है पिता जी।" कन्चन अपने कमरे में चली गयी। बिस्तर में लेटते ही उसकी आंख लग गयी। तीन घन्टे की चुदाई से वो बहुत थक गयी थी। सासु मां के आने से पहले वो करीब एक घंटा घोड़े बेच के सोयी।
समाप्त
एक दिन फिर से सासु मां को शहर जाना था। इस बार रामलाल ने फिर उन्हें अकेला ही भेज दिया। बीवी के जाने के बाद वो कन्चन से बोला, "बहु आज बदन में बहुत दर्द हो रहा है ज़रा कमला को बुला दो। बहुत अच्छी मालिश करती है। बदन का दर्द दूर कर देगी।"
ये सुन के कन्चन को जलन होने लगी। वो जानती थी कमला कैसी मालिश करेगी। कन्चन ने सोचा आज अच्छा मौका है। सासु मां भी नहीं है।
वो बोली, "क्यों पिताजी? घर में बहु के रहते आप किसी और को क्यों मालिश के लिये बुलाना चाहते हैं? आपने हमारी मालिश कहां देखी है? एक बार करवा के देखिये, कमला की मालिश भूल जाएंगे।"
"अरे नहीं बेटी, हम अपनी बहु से कैसे मालिश करवा सकते हैं?" रामलाल के मन में लड्डू फूटने लगे। वो सोच रहा था की ये तो सुनहरा मौका है। हाथ से नहीं जाने देना चाहिये।
"आप हमें बेटी बोल रहे हैं लेकिन शायद अपनी बेटी की तरह नहीं मानते? आपकी सेवा करके हमें बहुत खुशी मिलती है।"
"ऐसा ना कहो बहु। तुम बेटी के समान नहीं हमारी बेटी ही हो। तुम सचमुच बहुत अच्छी हो। लेकिन तुम्हारी सासु मां को पता चल गया तो वो मुझे मार डालेगी।"
"कैसे पता चलेगा पिताजी वो तो शाम तक आएगी। चलिये अब हम आपकी मालिश कर देते हैं। आपको भी तो पता चले की आपकी बहु कैसी मालिश करती है।"
"ठीक है बहु। लेकिन अपनी सासु मां को बताना नहीं।"
"नहीं बताएंगे पिताजी, आप बेफिक्र रहिये।"
रामलाल ने जल्दी से ज़मीन पे चटाई बिछा दी और धोती को छोड़ के सब कपड़े उतार के लेट गया। उसका दिल धक धक कर रहा था। कन्चन रामलाल के गठे हुए बदन को देखती ही रह गयी। वाकई में सच्चा मर्द था। चौड़ी छाती और उसपे घने काले बाल देख कर तो कन्चन के दिल पे छुरिआं चलने लगी। कन्चन ने रामलाल की टांगों की मालिश शुरु कर दी। साड़ी के पल्लु से उसने घूंघट भी कर रखा था। बहु के मुलायम हाथों का स्पर्श रामलाल को बहुत अच्छा लग रहा था। कन्चन ने पहले से ही प्लान बना रखा था। अचानक तेल की बोतल कन्चन की साड़ी पे गिर गयी।
"ऊफ हमारी साड़ी खराब हो गयी।"
"बहु साड़ी पहन के कोई मालिश करता है क्या। खराब कर ली ना अपनी साड़ी? चलो साड़ी उतार लो, फिर मालिश करना।"
"जी, मैं सलवार कमीज़ पहन के आती हूं।"
"अरे उसकी क्या ज़रूरत है? साड़ी उतार लो बस। सलवार पे तेल गिर गया तो सलवार उतारनी पड़ जाएगी। अगर सलवार उतारना मंज़ूर है तो ठीक है सलवार कमीज़ पहन आओ।"
"हाय सलवार कैसे उतारेंगे। सलवार उतारने से तो अच्छा है कि साड़ी ही उतार दूं, लेकिन आपके सामने साड़ी कैसे उतारुं? हमें तो शरम आती है।’
"शरम कैसी बहु? तुम तो हमारी बेटी के समान हो। और फिर हम तो तुम्हें पेटिकोट ब्लाउज में कई बार देख चुके हैं। अपने ससुर से कोई शर्माता है क्या?"
"ठीक है पिताजी। उतार देती हूं।" कन्चन ने बड़ी अदा के साथ अपनी साड़ी उतार दी। अब वो केवल पेटिकोट और ब्लाउज में थी। पेटिकोट उसने बहुत नीचा बांध रखा था। ब्लाउज भी सामने से लो-कट था। अचानक कन्चन कमरे से बाहर भागी.
"अरे क्या हुआ बहु कहां जा रही हो?" रामलाल ने पूछा।
"जी बस अभी आई। अपनी चुन्नी तो ले आऊं।" रामलाल तो बहु के ऊपर नीचे होते हुए नितम्बों को देख कर निहाल हो गया।
कन्चन थोड़ी देर में वापस आ गयी। अब उसने चुन्नी से घूंघट निकाल रखा था। लेकिन कमर पे बहुत नीचे बंधे पेटिकोट और लो-कट ब्लाउज में से उसकी जवानी बाहर निकल रही थी। कन्चन रामलाल के पास बैठ गयी और उसने फिर से रामलाल की टांगों की मालिश शुरु कर दी। इस वक्त कन्चन का सिर रामलाल के सिर की ओर था। मालिश करते हुए बहु इस प्रकार से झुकी हुई थी की लो-कट ब्लाउज में से उसकी बड़ी बड़ी झूलती हुई चूचिआं रामलाल को साफ़ दिखाई दे रही थी। मालिश करते हुए दोनों इधर उधर की बातें कर रहे थे। कन्चन को अच्छी तरह मालूम था की ससुर जी की नज़रें उसके ब्लाउज के अन्दर झांक रही हैं। आज तो कन्चन ने ठान लिया था कि ससुर जी को पूरी तरह तड़पा के ही छोड़ेगी। मर्दों को तड़पाने की कला में तो वो माहिर थी ही।
इतने में रामलाल ने बहु से पूछा, "बहु तुमने वो गाना सुना हई, चुन्री के नीचे क्या है? चोली के पीछे क्या है?"
"जी पिताजी सुना है। आपको अच्छा लगता है।?" कन्चन आगे झुकते हुए ससुर जी को अपनी गोरी गोरी चूचिओं के और भी ज़्यादा दर्शन कराती हुई बोली।
"हां बहु बहुत अच्छा लगता है।" कन्चन समझ रही थी की ससुर जी का इशारा किस ओर है। ससुर जी की जांघों तक मालिश करने के बाद कन्चन ने सोचा की अब ससुर जी को उसके नितम्बों के दर्शन कराने का वक्त आ गया है। कन्चन जानती थी की उसके नितम्ब मर्दों पर क्या असर करते हैं। उसने जांघों से नीचे की ओर मालिश करने के बहाने अब अपना मुंह ससुर जी के पैरों की ओर और अपने विशाल चूतड़ ससुर जी के मुंह की ओर कर दिये। मालिश करते हुए उसने अपने चूतड़ों बड़े ही मादक ढंग से पीछे की ओर उभार दिया। रामलाल के दिल पे तो मानो छुरी चल गयी। पेटिकोट के महीन कपड़े में से बहु की गुलाबी रंग की कच्छी झांक रही थी।
रामलाल बहु के विशाल चूतड़ों को ललचायी नज़रों से देखता हुआ बोला, "अरे बहु ऐसे मालिश करने में परेशानी होगी। हमारे ऊपर आ जाओ।"
"हाय राम आपके ऊपर कैसे आ सकते हैं?"
"अरे इसमें शर्माने की क्या बात है? अपनी एक टांग हमारे एक तरफ़ और दूसरी टांग दूसरी तरफ़ कर लो।"
"जी आपको परेशानी तो नहीं होगी?"
कन्चन रामलाल के ऊपर आ गयी। अब उसका एक घुटना ससुर जी के कमर के एक तरफ़ और दूसरा घुटना कमर के दूसरी तरफ़ था। पेटिकोट घुटनों तक ऊपर करना पड़ा। इस मुद्रा में कन्चन के विशाल चूतड़ रामलाल के मुंह के ठीक सामने थे। घुटनों से नीचे कन्चन के गोरे गोरे पैर नंगे थे। कन्चन रामलाल के पैरों की ओर मुंह करके उसकी जांघों से नीचे की ओर मालिश कर रही थी। रामलाल का मन कर रहा था की बहु के चूतड़ों के बीच मुंह दे दे। वो पेटिकोट के महीन कपड़े में से बहु के विशाल चूतड़ों पे सिमटती हुई कच्छी को देख रहा था।
"बहु तुम जितनी समझदार हो उतनी ही सुन्दर भी हो।"
"सच पिता जी? कहीं आप हमें खुश करने के लिये तो नहीं बोल रहे हैं।"
"तुम्हारी कसम बहु हम झूठ क्यों बोलेंगे? तभी तो हमनें तुम्हें एकदम राकेश के लिये पसन्द कर लिया था। शादी से पहले तुम्हारे पीछे बहुत लड़के चक्कर लगाते होंगे?"
"जी वो तो सभी लड़किओं के पीछे चक्कर लगाते हैं।"
"नहीं बहु सभी लड़किआं तुम्हारी तरह सेक्सी नहीं होती। बोलो, लड़कें बहुत तंग करते थे क्या?"
"हां पिता जी करते तो थे।"
"क्या करते थे बहु?"
"अब हम आपको वो सब कैसे बता सकते हैं?"
"अरे फिर से वही शर्माना। चलो बताओ। हमें ससुर नहीं, अपना दोस्त समझो।"
"जी सीटियां मारते थे। कभी कभी तो बहुत गन्दे गन्दे कमैन्ट भी देते थे। बहुत सी बातें तो हमें समझ ही नहीं आती थी।"
"क्या बोलते थे बहु?"
"उनकी गंदी बात हमें समझ नहीं आती थी। लेकिन इतना ज़रूर पता था की हमारी छातिओं और नितम्बों पे कमैन्ट देते थे। कैसे खराब होते हैं लड़के। घर में मां बहन नहीं होती क्या?"
"और क्या क्या करते थे?"
"जी, क्लास में भी लड़कें जान बूझ के अपनी पेन्सिल हमारे पैरों के पास फेंक देते थे और उसे उठाने के बहाने हमारी स्किर्ट के अन्दर टांगों के बीच में झान्कने की कोशिश करते थे। स्कूल की ड्रेस स्किर्ट थी नहीं तो हम सलवार कमीज़ ही पहन के स्कूल जाते। लड़कें लोग होते ही बहुत खराब हैं।"
"नहीं बहु लड़कें खराब नहीं होते। वो तो बेचारे तुम्हारी जवानी से परेशान रहते होंगे।"
"लेकिन किसी लड़की पे गंदे गंदे कमैन्ट देना और उसकी टांगों के बीच में झांकना तो बदतमीज़ी होती है ना पिताजी?"
"इसमें बदतमीज़ी की क्या बात है बहु। बचपन से ही हर मर्द के मन में औरत की टांगों के बीच में झान्कने की इच्छा होती है और जब वो बड़ा हो जाता है तब तो औरत की टांगों के बीच में पहुंचना ही उसका लक्ष्य बन जाता है।"
"हाय! ये भी क्या लक्ष्य हुआ? मर्द लोग तो होते ही ऐसे हैं।"
"लेकिन बहु लड़कियां भी तो कम नहीं होती। देखो ना आज कल तो शहर की ज्यादातर लड़कियां शादी से पहले ही अपना सब कुछ दे देती हैं। तुम भी तो शहर की हो बहु।"
"अच्छा पिता जी! क्या मतलब आपका? हम वैसे नहीं हैं। इतने लड़कें हमारे पीछे पड़े थे, यहां तक कि कई मास्टर जी लोग भी हमारे पीछे पड़े थे, लेकिन हमने तो शादी से पहले ऐसा वैसा कुछ नहीं किया।"
"सच बहु? यकीन नहीं होता की इतनी सेक्सी लड़की को लड़कों ने कुंवारा छोड़ दिया होगा।"
"हमने किसी लड़कें को आज तक हाथ भी नहीं लगाने दिया।"
"आज तक? बेचारा राकेश अभी तक कुन्वारा ही है। सुहाग रात को भी हाथ नहीं लगाने दिया?" रामलाल हंसता हुआ बोला।
"हां...पिता जी आप तो बहुत खराब हैं। सुहाग रात को तो पति का हक बनता है। उन्हें थोड़े ही हम मना कर सकते हैं।" कन्चन बड़े ही मादक ढंग से अपने चूतड़ों को रामलाल के मुंह की ओर उचकाती हुई बोली। रामलाल कन्चन के चूतड़ों से सिमट कर उनके बीच की दरार में जाती हुई कच्छी को देख देख कर पागल हो रहा था।
"बहु एक बात कहुं? तुम शादी के बाद से बहुत ही खूबसूरत हो गयी हो।"
"पिता जी आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे शादी से पहले हम बद्सूरत थे।"
"अरे नहीं बहु शादी से पहले भी तुम बहुत सन्दर थी लेकिन शादी के बाद से तो तुम्हारी जवानी और भी निखर आई है। हर लड़की की जवानी में शादी के बाद एकदम निखार आ जाता है।"
"ऐसा क्यों पिताजी?" कन्चन ने भोलेपन से पूछ.
"बहु, शादी से पहले लड़की एक कच्ची कली होती है। कली को फूल बनाने का काम तो मर्द ही कर सकता है ना। सुहाग रात को लड़की एक कच्ची कली से फूल बन जाती है। जैसे कली में फूल बनके निखार आ जाता है वैसे ही लड़की की जवानी में शादी के बाद निखार आने लगता है।"
"ऐसा क्या निखार आया हमारी जवानी में? हम तो पहले भी ऐसे ही थे।"
"बहु तुम्हारी जवानी में क्या निखार आया वो हमसे पूछो। तुम्हारा बदन एकदम भर गया है। कपड़े भी टाईट होने लगे हैं। देखो ये नितम्ब कैसे फैल गये हैं।" रामलाल कन्चन के दोनों चूतड़ों पे हाथ फेरता हुआ बोला।
"तुम्हारी ये कच्छी भी कितनी छोटी हो गयी है। करीब करीब पूरे ही नितम्ब इस कच्छी के बाहर हैं। शादी से पहले तो ऐसा नहीं था ना?"
आखिर कन्चन का प्लान सफ़ल होने लगा था। रामलाल का हाथ उसके उचके हुए चूतड़ों को सहला रहा था। कभी कभी रामलाल उसकी पैंटी लाईन पे हाथ फेरता। कन्चन को बहुत मज़ा आ रहा था।
रामलाल फिर बोला, "बहु लगता है तुम्हें ये गुलाबी रंग की कच्छी बहुत पसन्द है?"
"हाय! पिताजी आपको कैसे पता हमने कौन से रंग की कच्छी पहनी है?"
"बहु तुम्हारे नितम्ब हैं ही इतने चौड़े की उनके ऊपर कसे हुए पेटिकोट में से कच्छी भी नज़र आ रही है।"
"हाय राम! पिताजी हमें सलवार कमीज़ पहनने दीजिये। हमें शरम आ रही है।"
"अरे बहु शरम कैसी तुम तो हमारी बेटी के समान हो।" रामलाल कन्चन की कच्छी पे हाथ फेरता हुआ बोला। कन्चन भी रामलाल की टांगों पे मालिश करने का नाटक कर रही थी। रामलाल बहु के विशाल नितम्बों को दबाता हुआ बोला, "बहु तुम राजेश का ख्याल तो रखती हो ना?"
"जी आप बेफिकर रहिये हम उनका बहुत ख्याल रखते हैं। जब हम आपका इतना ख्याल कर सकते हैं तो क्या उनका नहीं करेंगे? उन्हें हमसे कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।"
"शाबाश बहु हमें तुमसे यही उम्मीद थी। लेकिन हमारा मतलब था की इस लाजवाब जवानी को बेकार तो नहीं कर रही हो। राजेश को खुश तो रखती हो। वो जो कुछ चाहता है उसे देती हो ना।"
"जी वो जो चाहते हैं हम उन्हें देते हैं। जैसा खाना पसन्द है वैसा ही बनाते हैं।" कन्चन रामलाल का मतलब अच्छी तरह समझ रही थी लेकिन अन्जान बनने का नाटक कर रही थी।
"बहु, तुम तो बहुत भोली हो। हम खाने पीने की बात नहीं कर रहे। खाने पीने के इलावा भी मर्द की ज़रूरतें होती हैं जिंहें अगर बीवी पूरा ना करे तो मर्द दूसरी औरतों के पास जाने लगता है। उसे अपनी जवानी रोज़ देती हो कि नहीं?"
कन्चन शर्माने का नाटक करती हुई बोली, "पिताजी आप ये कैसी बातें कर रहे हैं? हमें तो बहुत शरम आ रही है।"
"अपने ससुर से क्या शर्माना बहु? हमारी बहु खुश है या नहीं ये जानना हमारा फर्ज़ है। बोलो है या नहीं?"
"जी है।"
"तो फिर बताओ उसे रोज़ देती हो या नहीं?" रामलाल का हाथ अब फिसल कर कन्चन के चूतड़ों की दरार में आ गया था। वो उसके चूतड़ों की दरार में हाथ फेरता हुआ बोला "बोलो बहु शर्माओ नहीं।"
"ज्ज्ज...जी, वो जब चाहते हैं ले लेते हैं। हम कभी मना नहीं करते।"
"वो जब चाहता है तब लेता है। तुम अपने आप कभी नहीं देती हो?"
"हुम तो औरत हैं। पहल करना तो मर्द का काम होता है।" कन्चन ने मन ही मन सोचा की रामलाल ने कितने सफ़ाई से लेने देने की बातें शुरु कर दी थी और अब तो उसके चूतड़ों की दरार में भी हाथ फेर रहा था। सचमुच ससुर जी काफ़ी मंझे हुए खिलाड़ी थे।
रामलाल बोल रहा था,"बहु तुम इतनी सेक्सी हो। वो नालायक तो तुम्हारी रोज़ लेता होगा?"
"पिता जी प्लीज़...! आप ये सब क्यों पूछ रहे हैं? हुमें तो बहुत शरम आ रही है।"
"अभी हमनें कहा था की हमारा बेटा और बहु खुश हैं या नहीं ये जानना हमारा फ़र्ज़ है। जबाब दो। रोज़ लेता तो है ना तुम्हारी?"
"नहीं पिताजी ऐसी कोई बात नहीं है। उन्हें तो फुर्सत ही नहीं मिलती। ओफ़िस से थक के आते हैं और जल्दी ही सो जाते हैं। महीने में मुश्किल से एक दो बार ही.....हमें तो लगता है की शायद हम इतने सैक्सी हैं ही नहीं कि हम उन्हें रिझा सकें।"
"कैसी बातें करती हो बहु? तुम तो इतनी सन्दर ओर सेक्सी हो कि तुम्हें कपड़ों में देख कर भी किसी बाल ब्रह्मचारी का लंड खड़ा हो जाए और अगर नंगी हो जाओ तब तो भगवान भी अपने पे काबू नहीं कर सकते।" पहली बार रामलाल ने कन्चन के सामने लंड जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। चूतड़ों की दरार में हाथ रगड़ने और रामलाल के मुंह से इस तरह की बातें सुन के कन्चन की चूत गीली होने लगी थी।
वो शर्माने का नाटक करते हुए बोली, "हाय! पिताजी आप अपनी बहु के सामने ये कैसे गन्दे शब्द बोल रहे हैं? हमें तो बहुत शरम आ रही है। प्लीज़ अब हमें जाने दीजिये ना।"
रामलाल दोनों हाथों से कन्चन के विशाल चूतड़ों को दबाता हुआ बोला, "अरे बहु इसमें शर्माने की क्या बात है। अब मर्द के लंड को लंड नहीं तो और क्या कहें? बोलो तुम्हारे पास लंड के लिये कोई और शब्द है तो बताओ।"
कन्चन शर्माने का नाटक करती हुई चुप रही।
"अरे बहु बोलो! चुप क्यों हो?"
"जी हमें नहीं पता। हमनें भी लड़कों के मुंह से ये ही शब्द सुना है।"
"तो फिर लंड को लंड कहने में शरम कैसी? लेकिन बहु महीने में सिर्फ़ एक दो बार से तुम्हारा काम चल जाता है? तुम्हारी इस जवानी को तो रोज़ मर्द की ज़रूरत है।"
"अब हम कर भी क्या सकते हैं?"
"उसे तुम्हारी पसन्द तो है न?"
"जी, हमें क्या पता?"
"ये बात तो हर औरत को पता होनी चाहिये। वैसे कुछ मर्दों को वो औरतें पसन्द होती हैं जिनकी बहुत फूली हुई होती है। तुम्हारी कैसी है बहु?" रामलाल मज़े लेता हुआ बोला।
"जी हमें क्या पता?"
"बहु तुम्हें कुछ पता भी है? चलो हम ही पता कर लेते हैं हमारी बहु रानी की कैसी है।" ये कहते हुए रामलाल ने कन्चन के चूतड़ों के बीच हाथ डाल कर पेटिकोट के ऊपर से ही उसकी फूली हुई चूत को अपनी मुट्टी में भर लिया। बाप रे क्या फूली हुई चूत थी बहु की।
ये कहते हुए रामलाल ने कन्चन के चूतड़ों के बीच हाथ डाल कर पेटिकोट के ऊपर से ही उसकी फूली हुई चूत को अपनी मुट्टी में भर लिया। बाप रे क्या फूली हुई चूत थी बहु की।
"ऊइइइइइइइइई.......इइस्स्स...। पिता जी !आआआह....... प्लीज़! ये आप क्या कर रहे हैं? छोड़िये ना....। हम आपकी बहु हैं।" लेकिन कन्चन ने अपनी चूत छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। बल्कि अपनी टांगें इस प्रकार से चौड़ी कर ली और चूतड़ ऊपर की ओर उचका दिये कि उसकी चूत रामलाल के हाथ में ठीक तरह से समा जाए। कन्चन के पूरे बदन में वासना की लहर दौड़ रही थी।
"क्या छोड़ू बहु?"
"वही जो आपने पकड़ रखी है। प्लीईइइइइज......छोड़िये ना आह आह......"
"हमनें क्या पकड़ रखी है? बता दो तो छोड़ देंगे।"
"वही जो औरतों की टांगों के बीच में होती है।"
"क्या होती है बहु?"
"ऊफ! पिताजी आप तो बड़े वो हैं! छोड़िये ना हमारी...प्लीज़...आह"
"जब तक बताओगी नहीं कि क्या छोड़ें तब तक हमें कैसे पता चलेगा की क्या छोड़ना है?"
"हाय राम! हमें सचमुच नहीं पता उसे क्या कहते हैं। आप ही बता दीजिये।"
"बहु तुम इतनी भी भोली नहीं हो। चलो हम ही बता देते हैं। इसे चूत कहते हैं।"
"ठीक है हमारी....हमारी..च..चूत छोड़ दीजिये प्लीज़...हम आपकी बहु हैं।"
"हां, अब हुई ना बात बहु। ’चूत’ बोलने में इतना शर्माती हो, कहीं चूत देने में भी तो इतना नहीं शर्माती? तभी बेचारा राकेश तुम्हारी ले नहीं पाता होगा।" रामलाल कन्चन की चूत मुट्ठी में मसलता हुआ बोला।
"इस्स्स्स्स्स......... क्या कर रहे हैं? प्लीज़ छोड़िये ना हमारी..."
"पहले बताओ, चूत देने में भी इतना शर्माती हो?"
"नहीं, पहले आप हमारी छोड़िये। फिर बताऊंगी।"
"फिर वही बात। हमारी छोड़िये, हमारी छोड़िये कर रही हो। आखिर क्या छोड़ें?"
"ऊफ पिता जी आप तो बहुत ही खराब हैं। प्लीज़ हमारी चूत छोड़ दिजिये। हम तो आपकी बेटी के समान हैं।"
"ठीक है बहु ये लो छोड़ देते हैं।" जैसे ही रामलाल ने कन्चन की चूत को आज़ाद किया वो रामलाल के ऊपर से उठ कर साईड में बैठ गयी।
"पिताजी आप तो बड़े खराब हैं। अपनी बहु के साथ ऐसा करता है कोई? अब हम आपकी मालिश साईड में बैठ कर ही करेंगे।"
"अरे बहु की चूत पकड़ना मना है क्या? ठीक है साईड में बैठ के मालिश कर दो। लेकिन बहु तुम्हारी चूत तो बहुत फूली हुई है। मर्द तो ऐसी ही चूत के लिये तरसते हैं। अब बताओ, अपनी इस प्यारी चूत को देने में तो शरम नहीं करती हो।"
"जी, देने में किस बात की शरम? वैसे भी जब वो लेते हैं तो लाईट बन्द होती है। उन्हें कैसे पता चलेगा की हमारी कैसी है?"
"शबाश बहु चूत देने में कोई शरम नहीं करनी चाहिये। लेकिन वो नालायक लाईट बन्द करके चोदता है तुम्हें? तुम जैसी सन्दर और सेक्सी औरत को तो नंगी देखने के लिये भगवान भी तड़प जाए। औरत को चोदने का मज़ा तो उसे पूरी तरह नंगी करके ही आता है। और उसकी नंगी जवानी का रस पान करने के लिये लाईट जला के चोदना तो ज़रूरी है।" कन्चन ने नोटिस किया की रामलाल ने अब ‘लेने देने’ की जगह ‘चोदने’ जैसा शब्द बोलना शुरु कर दिया था।
"लेकिन पिता जी वो तो ऐसा कुछ भी नहीं करते।"
"तुम्हारा मतलब वो तुम्हें नंगी तक नहीं करता?"
"जी नहीं।" कन्चन शर्माते हुए बोली।
"तो फिर?"
"फिर क्या?"
"तो फिर कैसे चोदता है वो हमारी प्यारी बहुरानी को?"
"बस पेटिकोट ऊपर उठा के...."
"बहुत ही नालायक है। लेकिन उसका लंड बड़ा तो है न?"
"जी वो तो खासा लम्बा और मोटा है।"
"उस गधे के लंड जैसा? तब तो हमारी बहु की तृप्ति कर देता होगा।"
"हाय...! उस गधे के जितना तो किसी का भी नहीं हो सकता, और फिर सिर्फ़ बड़ा होने से कुछ नहीं होता। मर्द को भी तो औरत को तृप्त करने की कला आनी चाहिये। वो तो अक्सर पैंटी भी नहीं उतारते, बस साईड में करके ही कर लेते हैं।"
"ये तो गलत बात है। ऐसे तो हमारी बहु की प्यास शान्त नहीं हो सकती। लेकिन बहु तुम्हें ही कुछ करना चाहिये। अगर औरत काम कला में माहिर ना हो तो मर्द दूसरी औरतों की ओर भागने लगता है। बीवी को बिस्तर में बिल्कुल रंडी बन जाना चाहिये तभी वो अपने पति का दिल जीत सकती है।"
"आपकी बात सही है पिताजी, हम तो सब कुछ करने के लिये तयार हैं। लेकिन मर्द अपनी बीवी के साथ जो कुछ भी करना चाहता है उसके लिये पहल तो उसे ही करनी होती है ना। वो जो भी करना चाहें हम तो हमेशा उनका साथ देने के लिये तैयार हैं।"
"हमें लगता है की हमारी बहु प्यासी ही रह जाती है। क्यों सही बात है?"
"जी।"
"कहो तो हम उसे समझाने की कोशिश करें? ऐसा कब तक चलेगा ?"
"नही नहीं पिताजी, उनसे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है।"
"तो फिर ऐसे ही तड़पती रहोगी बहु?"
"और कर भी क्या सकते हैं?"
रामलाल को अब विश्वास हो गया था कि उसका बेटा बहु के जिस्म की प्यास को नहीं बुझा पता है। इतनी खूबसूरत जवानी को इस तरह बर्बाद करना तो पाप है। अब तो उसे ही कुछ करना होगा। कन्चन फिर से रामलाल की टांगों की मालिश करने लगी। कन्चन का मुंह अब रामलाल की ओर था। बार बार इस तरह से झुकती की उसकी बड़ी बड़ी चूचिआं और ब्रा रामलाल को नज़र आने लगते। रामलाल अच्छी तरह जानता था कि आज सुनेहरा मौका था। लोहा भी गरम था। आज अगर बहु की जवानी लूटने में कामयाब हो गया तो ज़िन्दगी बन जाएगी। रामलाल का लंड बुरी तरह फनफनाया हुआ था, और टाईट लंगोट की साईड में से आधा बाहर निकल आया था और उसकी जांघ के साथ सटा हुआ था।
रामलाल बोला, "देखो बहु तुम चाहती हो तुम्हारी जवानी की आग ठंडी हो?"
"जी कौन औरत नहीं चाहती?"
"हम तुम्हारे ससुर हैं। तुम्हारी जवानी की आग को ठंडा करना हमारा धर्म है। हमें ही कुछ करना होगा।"
"आप क्या कर सकते हैं पिताजी? हमारी किस्मत ही ऐसी है।" कन्चन एक ठंडी सांस लेते हुए रामलाल की जांघ पे तेल लगती हुई बोली।
"ऐसा ना कहो बहु। अपनी किस्मत तो अपने हाथ में होती है। अरे बहु, तुमने हमारी कमर से ले के टांगों तक तो मालिश कर दी लेकिन एक जगह तो छोड़ ही दी।"
"कौन सी ?"
"अरे धोती के नीचे भी बहुत कुछ है। वहां भी मालिश कर दो।"
"जी वहां...?"
"भई नहीं करना चाहती हो तो कोई बात नहीं हम वहां कमला से मालिश करवा लेंगे।"
"नहीं नहीं पिताजी कमला से क्यों? हम हैं ना।" कन्चन ने शर्माते हुए रामलाल की धोती ऊपर कर दी। नीचे का नज़ारा देख के उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। कसे हुए लंगोट का उभार देखने लायक था। कन्चन ने लंगोट वाले इलाके को छोड़ के लंगोट के चारों ओर मालिश कर दी।
"लीजिये पिताजी वहां भी मालिश कर दी।"
"बहु वहां तो अभी और भी बहुत कुछ है।"
"और तो कुछ भी नहीं है।"
"ज़रा लंगोट के नीचे तो देखो बहुत कुछ मिलेगा।"
"हाय.....! लंगोट के नीचे! वहां तो आपका वो है। हमें तो बहुत शरम आ रही है।"
"शरम कैसी बहु? तुम तो ऐसे शर्मा रही हो जैसे कभी मर्द का लंड नहीं देखा।"
"जी किसी पराए मर्द का तो नहीं देखा ना।"
"अच्छा तो तुम हमें पराया समझती हो?"
"नहीं नहीं पिता जी ऐसी बात नहीं है।"
"अगर ऐसी बात नहीं है तो इतना शर्मा क्यों रही हो? वो तुम्हें काटेगा नहीं। चलो लंगोट खोल दो ओर वहां की भी मालिश कर दो।"
"जी हम तो आपकी बहु हैं। हम आपके उसको कैसे हाथ लगा सकते हैं?"
"ठीक है बहु कोई बात नहीं, वहां की मालिश हम कमला से करवा लेंगे।"
"नहीं नहीं पिताजी ये आप क्या कह रहे हैं? किसी परायी औरत से तो अच्छा है हम ही वहां की मालिश कर दें।"
"तो फिर शर्मा क्यों रही हो बहु?" ये कहते हुए रामलाल ने बहु का हाथ पकड़ के लंगोट पे रख दिया। लंगोट के ऊपर से ससुर जी के मोटे लंड की गर्माहट से कन्चन कांप गयी। कांपते हुए हाथों से कन्चन ससुर जी का लंगोट खोलने की कोशिश कर रही थी। आखिर आज ससुर जी का लंड देखने की मुराद पूरी हो ही जाएगी। जैसे ही लंगोट खुला रामलाल का लंड लंगोट से अज़ाद होके एक झटके के साथ तन के खड़ा हो गया। ११ इन्च के लम्बे मोटे काले लंड को देख के कन्चन के मुंह से चीख निकल गयी।
"ऊइई माआआआ....ये क्या है..?"
"क्या हुआ बहु...?"
"जी..इतना लम्बा..."
"नहीं पसन्द आया?"
"जी वो बात नहीं है। मर्द का इतना बड़ा भी हो सकता है? सच पिताजी ये तो बिकुल उस गधे के जैसा है। अब समझी सासु मां आपको क्यों गधा कहती हैं।"
"घबराओ नहीं बहु हाथ लगा के देख लो। काटेगा नहीं।" कन्चन मन ही मन सोचने लगी काटेगा तो नहीं लेकिन मेरी चूत ज़रूर फाड़ देगा। बाप का लंड तो बेटों के लंड से कहीं ज़्यादा तगड़ा निकला कन्चन उस फौलादी लौड़े को सहलाने के लिये बेचैन तो थी ही। उसने ढेर सारा तेल अपने हाथ में ले के रामलाल के तने हुए लौड़े पे मलना शुरु कर दिया। ना जाने कितनी चूतों का रस पी के इतना मोटा हो गया था। क्या भयन्कर सुपाड़ा था। मोटा लाल हथोड़े जैसा। कुन्वारी चूत के लिये तो बहुत खतरनाक हो सकता था। कन्चन को दोनों हाथों का इस्तेमाल करना पड़ रहा था, फिर भी रामलाल का लौड़ा उसके हाथों में नहीं समा रहा था। इतना मोटा था कि दोनों हाथों से उसकी मोटाई नापनी पड़ी। जब जब कन्चन का हाथ लंड पे मालिश करते हुए नीचे की ओर जाता, लंड का मोटा लाल सुपाड़ा और भी ज़्यादा भयन्कर लगने लगता।
"पिता जी एक बात पूछुं? बुरा तो नहीं मानेंगे?"
"नहीं बहु ज़रूर पुछो।"
"जी सासु मां तो आपसे बहुत खुश होंगी?"
"वो क्यों?" रामलाल अन्जान बनता हुआ बोला।
"इतना लम्बा और मोटा लौड़ा पा कर के कौन औरत खुश नहीं होगी?"
"अरे नहीं बहु ये ही तो हमारी बदकिस्मती है। बस एक गलती कर बैठे, उसका फल अभी तक भुगत रहे हैं।"
"कैसी गलती पिताजी?"
"अरे बहु सुहाग रात को जोश जोश में कुछ ज़्यादा ज़ोर से धक्के मार दिये और पूरा लंड तुम्हारी सासु मां की चूत में पेल दिया। तुम्हारी सासु मां तो कुन्वारी थी। झेल नहीं सकी। बहुत खून खराबा हो गया था। बेचारी बेहोश हो गयी थी। बस उसके बाद से मन में इतना डर बैठ गया की आज तक चुदवाने से डरती है। बड़ी मिन्नत करके ६ महीने में एक बार चोद पाते हैं, उसके बाद भी आधे से ज़्यादा लंड नहीं डालने देती।"
"ये तो गलत बात है। पति की ज़रूरत पूरी करना तो औरत का धर्म होता है। कोशिश करती तो कुछ दिनों में सासु मां की आदत पड़ जाती।"
"क्या करें हमारी दास्तान भी कुछ तुम्हारे जैसी है।"
"ओह ! फिर तो आप भी हमारी तरह प्यासे हैं।"
"हां बहु। सासु मां को तो हमारा पसन्द नहीं आया लेकिन तुम्हें हमरा लंड पसन्द आया या नहीं?"
"जी ये तो बहुत प्यारा है। इतना बड़ा तो औरत को बड़े नसीब से मिलता है। सच, हमें तो सासु मां से जलन हो रही है।" कन्चन बड़े प्यार से रामलाल के लौड़े को सहलाते हुए बोली। उसने फिर से अपना मुंह रामलाल की टांगों की ओर और चूतड़ रामलाल के मुंह की ओर कर रखे थे। लंड और टांगों की मालिश करने के बहाने वो आगे की ओर झुकी हुई थी और चूतड़ रामलाल की ओर उचका रखे थे।
"अरे इसमें जलन की क्या बात है? आज से ये तुम्हारा हुआ।" रामलाल बहु के चूतड़ों पे हाथ फेरता हुआ बोला।
"जी मैं आपका मतलब समझी नहीं।"
"देखो बहु, हमसे तुम्हारी बर्बाद होती ये जवानी देखी नहीं जाती। हमारे रहते हमारी प्यारी बहु तड़पती रहे ये तो हमारे लिये शर्म की बात है। आखिर हम भी तो मर्द हैं। हमारे पास भी वो सब है जो तुम्हारे उस नालायक पति के पास है। अब हमें ही अपनी बहु की प्यास बुझानी पड़ेगी।" रामलाल का हाथ पेटिकोट के ऊपर से ही बहु के विशाल चूतड़ों की दरार में से होता हुआ उसकी चूत पे आ गया।
"हाय....! पिता जी ये आप क्या कह रहे हैं? आपका मतलब आप हमें....अपनी बहु को..?"
"हां बहु हम अपनी बहु को चोदेंगे। तुम्हारी इस जवानी को एक मोटे तगड़े लौड़े की ज़रूरत है। हमारी टांगों के बीच में अब भी बहुत दम है।" रामलाल का हाथ अब धीरे धीरे बहु की टांगों के बीच उसकी फुली हुई चूत को पेटिकोट और पैंटी के ऊपर से ही सहला रहा था।
"पिता जी..! प्लीज़..! ऐसा नहीं कहिये। हम आपके जज्बात समझते हैं लेकिन आखिर हम आपकी बहु हैं। आपके बेटे की पत्नी हैं। आपकी बेटी के समान हैं।" कन्चन रामलाल के बड़े बड़े टट्टों को सहलाती हुई बोली।
"ये सब सही है। तुम हमारी बहु हो, हमारी बेटी के समान हो। तभी तो हमारा फर्ज़ है कि हम तुम्हें खुश रखें। कोई गैर औरत होती तो हमें चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। लेकिन अपनी ही बहु के साथ ऐसा अत्याचार हो ये हमें मन्ज़ूर नहीं।" रामलाल ने ये कहते हुए बहु की चूत को अपनी मुट्ठी में भर के दबा दिया।
"इस्स्स्स्स...... अआह..छोड़िये ना पिताजी, आपने तो फिर पकड़ ली हमारी। सोचिये बेटी के समान बहु के साथ ऐसा करना पाप नहीं होगा?" कन्चन ने अपनी चूत छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। बल्कि टांगें इस प्रकार चौड़ी कर ली की रामलाल अच्छी तरह उसकी चूत पकड़ सके।
रामलाल बहु की चूत को और भी ज़ोर से मसलता हुआ बोला, "तो क्या ये जानते हुए भी की बेटी के समान बहु की चूत प्यासी है हम चुप बैठे रहें? जब बहु मायका छोड़ के ससुराल आती है तो ससुराल वालों का फर्ज़ बनता है की वो अपनी बहु की सब ज़रूरतों का ख्याल रखें।"
"लेकिन हमने तो आपको पिता के समान माना है, अब आपके साथ ये सब कैसे कर सकते हैं।"
"ठीक है बहु, अगर हमारे साथ नहीं कर सकती तो कोई बात नहीं हम गावं में एक ऐसा तगड़ा मर्द ढूंढ लेंगे जिसका लंड हमारी तरह लम्बा हो और जो हमारी बहु को अच्छी तरह चोद के उसके जिस्म की प्यास बुझा सके। बोलो ये मन्ज़ूर है?"
"हाय राम!.....ये क्या कह रहे हैं? किसी दूसरे से तो अच्छा है कि आप ही..." कन्चन दोनों हाथों से अपना मुंह छुपाती हुई बोली।
"इसमे शर्माने की क्या बात है? बोलो क्या कहना चाहती हो बहु?" रामलाल ने अब अपना हाथ बहु के पेटिकोट के अन्दर डाल दिया था और उसकी जांघें सहला रहा था।
"जी। हमारा मतलब था की अगर इतनी ही मजबूरी हो जाए तो घर की इज़्ज़त तो घर में रहनी चाहिये। किसी गैर मर्द को हम अपनी जवानी कैसे दे सकते हैं? हमारी इज़्ज़त घर वालों के पास ही रहेगी।"
"तो तुम हमें तो गैर नहीं समझती हो?"
"नहीं नहीं, पिताजी आप गैर कैसे हो सकते है?"
"सच बहु तुम जितनी खूबसूरत हो उतनी ही समझदार भी हो। घर की इज़्ज़त घर में ही रहनी चाहिये। तुम्हारी सब ज़रूरतें घर में ही पूरी की जा सकती हैं। हम इस बात का पूरा ध्यान रखेंगे कि तुम्हें किसी गैर मर्द के लंड की ज़रूरत ना महसूस हो।" रामलाल समझ गया था की बहु भी वासना की आग में जल रही है क्युंकि उसकी कच्छी उसकी चूत के रस से बिल्कुल भीग चुकी थी। लेकिन अपने ससुर से चुदवाने में झिझक रही थी। बहु की झिझक दूर करने के लिये उसे शुरु में थोड़ी ज़ोर ज़बर्दस्ती करानी पड़ेगी। लोहा गरम है, अगर अभी इस सुनहरे मौके का फयदा नहीं उठाया तो फिर बहु को नहीं चोद पायेगा। लेटे लेटे तो कुछ कर पाना मुश्किल था। रामलाल उठ के खड़ा हो गया।
"क्या हुआ पिता जी आप कहां जा रहे हैं?"
"कहीं नहीं बहु, अब तुम ठीक से सब जगह तेल लगा दो।"
रामलाल के खड़े होते ही उसकी धोती और लंगोट नीचे गिर गये। अब वो बिल्कुल नंगा बहु के सामने खड़ा था। उसका तना हुआ ११ इन्च का मोटा काला लंड बहुत भयन्कर लग रहा था। ये नज़ारा देख के कन्चन की तो सांस ही गले में अटक गयी। उसने खड़े हुए ससुर जी की टांगों में तेल लगाना शुरु किया। ससुर जी का तना हुआ लौड़ा उसके मुंह से सिर्फ़ कुछ इन्च ही दूर था। कन्चन का मन कर रहा था की उस मोटे मूसल को चूम ले।
"बहु थोड़ा हमारी छाती पे भी मालिश कर दो।"
ससुर जी की छाती पे मालिश करने के लिये कन्चन को भी खड़ा होना पड़ा। लेकिन ससुर जी का तना हुआ लंड उसे नज़दीक नहीं आने दे रहा था।
वो ससुर जी को छेड़ते हुए हंसती हुई बोली, "पिता जी, आपका गधे जैसा वो तो हमें नज़दीक आने ही नहीं दे रहा, आपकी छाती पे कैसे मालिश करें?"
"तुम कहो तो काट दें इसे बहु?"
"हाय राम! ये तो इतना प्यारा है। इसे नहीं काटने देंगे हम।" कन्चन ससुरजी के लौड़े को बड़े प्यार से सहलाती हुई बोली।
"तो फिर हमें कुछ और सोचना पड़ेगा।"
"हां पिताजी कुछ करिये ना। आपका ये तो बहुत परेशान कर रहा है।"
"ठीक है बहु, हम ही कुछ करते हैं।" ये कहते हुए रामलाल ने बहु के पेटिकोट का नाड़ा खींच दिया। नाड़ा खुलते ही पेटिकोट बहु की टांगों में गिर गया। दूसरे ही पल रामलाल ने बहु की बगलों में हाथ डाल के उसे ऊपर उठा लिया और खींच के अपनी बाहों में जकड़ लिया। इससे पहले की कन्चन की कुछ समझ में आता, उसने अपने आप को ससुर जी की छाती से चिपका पाया। वो सिर्फ़ ब्लाउज और पैंटी में थी। उसका पेटिकोट पीछे ज़मीन पे पड़ा हुआ था। ससुर जी का विशाल लंड उसकी टांगों के बीच ऐसे फंसा हुआ था जैसे वो उसकी सवारी कर रही हो।
"ऊई माआआ... पिताजीईईई..... ये आपने क्या किया? छोड़िये ना हमें।" कन्चन अपने आप को छुड़ाने का नाटक करती हुई बोली।
"तुम ही ने तो कहा था की हमारा लंड तुम्हें नज़दीक नहीं आने दे रहा है। देखो ना अब प्रोब्लम दूर हो गयी।"
"सच आप तो बड़े खराब हैं। अपनी बहु का पेटिकोट कोई ऐसे उतारता है?"
"मजबूरी थी बहु उतारना पड़ा। तुम्हारा पेटिकोट तुम्हें नज़दीक नहीं आने देता। लेकिन अब देखो ना तुम हमारे कितनी नज़दीक आ गयी हो।" रामलाल दोनों हाथों से बहु के विशाल चूतड़ों को दबा रहा था। बेचारी छोटी सी कच्छी मोटे मोटे चूतड़ों की दरार में घुसी जा रही थी। रामलाल के मोटे लौड़े ने बहु की कच्छी के कपड़े को सामने से भी उसकी चूत की दोनों फांकों के बीच में घुसेड़ दिया था। कन्चन को रामलाल के लंड की गर्माहट बेचैन कर रही थी। इतने दिनों से जिस लंड के सपने ले रही थी वो आज उसकी जांघों के बीच फंसा हुआ उसकी चूत से रगड़ खा रहा था।
"आय हाय! कितने मजबूर हैं आप जो आपको अपनी बहु का पेटिकोट उतारना पड़ा। लेकिन ऐसे चिपके हुए हम आपकी छाती की मालिश कैसे कर सकते हैं? छोड़िये ना हमें प्लीज़।"
"कोई बात नहीं बहु छाती पे नहीं तो पीठ पे तो मालिश कर सकती हो।" कन्चन ससुर जी के बदन से बेल लता की तरह लिपटी हुई थी। उसका सिर ससुर जी की छाती पे टिका हुआ था। उसने दोनों हाथों से पीठ की मालिश शुरु कर दी। रामलाल भी बहु की पीठ और चुतड़ों पे हाथ फेर रहा था। रामलाल के लौड़े से रगड़ खा के कन्चन की चूत बुरी तरह गीली हो गयी थी और पैंटी भी बिल्कुल उसके रस में भीग गयी थी। रामलाल के लंड का ऊपरी भाग बहु की चूत के रस में भीगा हुआ था। कन्चन का सारा बदन वासना की आग में जल रहा था।
"बहु तुम हमारी पीठ की मालिश करो, हम भी तुम्हारी पीठ की मालिश कर देते हैं।" रामलाल ने अपने हाथों में तेल ले कर बहु की पीठ पे मलना शुरु कर दिया। धीरे धीरे उसने बहु के विशाल नितम्बों पे से उसकी पैंटी को उनके बीच की दरार में सरका दिया और दोनों नितम्बों की दबा दबा के मालिश करने लगा। कन्चन के मुंह से हल्की हल्की सिसकियां निकल रही थी। पीठ पे मालिश करने के बहाने धीरे धीरे रामलाल ने बहु के ब्लाऊज के हुक खोल के ब्रा का हुक भी खोल दिया। कन्चन को महसूस तो हो रहा था की शायद ससुर जी उसके ब्लाउज और ब्रा का हुक खोल रहे हैं लेकिन वो अन्जान बनी रही।
जब ससुर जी ने उसका ब्लाउज और ब्रा को उतारना शुरु किया तो वो हड़बड़ा के बोली, "हाय राम!... पिताजी.. ये क्या कर रहे हैं? हमारा ब्लाउज क्यों उतार रहे हैं?" लेकिन कन्चन ने रामलाल से अलग होने की कोई कोशिश नहीं की।
"कहो तो बहु तुम्हारे ब्लाउज के ऊपर ही तेल लगा दें? बिना ब्लाउज उतारे तुम्हारी पीठ की कैसे मालिश होगी?" और इससे पहले की कन्चन कुछ बोलती रामलाल ने एक हाथ से बहु को अपने चिपका के रखा और दूसरे हाथ को ढीले हुए ब्रा के अन्दर डाल कर बहु की बड़ी बड़ी चूचिओं को मसलने लगा। कन्चन की चूचिओं पे मर्द का हाथ लगे दो महीने हो चुके थे। वो तो अब वासना आग में पागल हुई जा रही थी।
"इस्स्स....आआआआह...पिताजी......इस्स्स्स्स्स्स...ऐइइई...अआ..छोड़िये ना..अआह...धीरे...अब छोड़ दीजिये हमें...प्लीज़...आअआ...इआआह....इस्स्स्स्स धीरे....क्या कर रहे हैं?"
"कुछ नहीं बहु, तुम तो हमारी छाती पे मालिश कर नहीं सकी, हमनें सोचा हम ही अपनी बहु की छाती पे मालिश कर देते हैं।" बातों बातों में रामलाल ने बहु का ब्लाउज और ब्रा उसके बदन से अलग कर दिया। अब बहु के बदन पे सिर्फ़ एक छोटी सी कच्छी थी। रामलाल ने एक हाथ नीचे की ओर ले जा के बहु के चूत पे से उसकी कच्छी को साईड में कर दिया। अब रामलाल का लंड बहु की नंगी चूत से रगड़ रहा था।
"इस्स्स्स...हटिये भी पिताजी। आप तो सच मुच बहुत खराब हैं। अपनी जवान बहु को इस तरह कोई नंगी करता है? अब हमें कपड़े पहनने दीजिये।"
"बहु इसे कोई नंगी करना थोड़े ही कहते हैं। तुम्हें किसी मर्द ने नंगी करके चोदा जो नहीं है, इसीलिये नंगी होने का मतलब नहीं समझती हो। अभी तो तुम कच्छी पहने हुए हो।"
"हाय राम! तो अभी हमारी कच्छी भी उतारेंगे क्या?"
"हां बहु।"
"नहीं ना पिताजी...प्लीज़.. आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?"
"बहु, एक मर्द, औरत की कच्छी क्यों उतारता है?"
"जी वो... हमारा मतलब है...म्म्म्म...आआह"
"शर्माओ नहीं, बताओ तुम्हारा पति तुम्हारी कच्छी क्यों उतारता है?"
रामलाल बहु की चूचिआं मसल रहा था और उसका मोटा लम्बा लंड बहु की चूत की दोनों फांकों के बीच से होता हुआ पीछे की ओर दोनों नितम्बों के बीच में से झांक रहा था। कन्चन से अब और सहन नहीं हो रहा था। वो चाहती थी की ससुर जी अब जल्दी से जल्दी अपना गधे जैसा लौड़ा उसकी चूत में पेल दें। लेकिन एक तो औरत जात थी ऊपर से रिश्ता भी कुछ ऐसा था।
"बोलती क्यों नहीं बहु?"
"जी, वो तो हमें.. हमारा मतलब है.. वो तो हमें चोदने के लिये हमारी कच्छी उतारते हैं।" कन्चन दोनों हाथों से अपना मुंह छुपाते हुए बोली। पहली बार उसने ससुर जी के सामने चोदने जैसे शब्द का इस्तेमाल किया।
"लेकिन उस नालयक ने तुम्हें कभी नंगी करके नहीं चोदा ना?"
"नहीं पिताजी। लेकिन ये सब आप क्यों पूछ रहे हैं?"
"इसलिये बहु कि अब हम तुम्हारी कच्छी उतारके और तुम्हें पूरी तरह नंगी करके चोदेंगे। अब तुम्हें पता चलेगा की जब मर्द औरत को नंगी करके चोदता है तो औरत को कितना मज़ा आता है।"
"हाय राम! पिता जी.. हमें चोद के आपको पाप लगेगा।"
"इस लाजवाब जवानी को चोदने से अगर पाप लगता है तो लगे। अरे बहु अपने जिस्म की आवाज़ सुनो। अपनी चूत की आवाज़ सुनो। बताओ अगर तुम्हारी चूत को इस लंड की ज़रूरत नहीं है तो उसने हमारे लंड को गीला क्यों कर दिया है?"
"आप अपने गधे जैसे उसको हमारे वहां रगड़ेंगे तो हमारी चूत गीली नहीं होगी क्या?"
"अब इतना गीला कर ही दिया है तो उसे अपनी प्यारी खूबसूरत सी चूत का रस भी पी लेने दो।"
लोहा गरम था। रामलाल ने अब देर करना ठीक नहीं समझा। बस एक बार किसी तरह बहु की चूत में लंड फंसा ले, फिर सब ठीक हो जाएगा। उसने एक झटके में बहु की चूत के रस में सनी हुई पैंटी पकड़ के नीचे खिसका दी। अब कन्चन बिल्कुल नंगी थी।
रामलाल ने बहु को अपनी बाहों में जकड़ लिया और अपने होंठ बहु के रसीले होंठों पे रख दिये। कन्चन भी ससुर जी से लिपटी हुई थी। उसकी चूत बुरी तरह गिली थी। चूत के रस में सनी पैंटी उसके पैरों में पड़ी हुई थी। कन्चन ने पैरों पे उचक के रामलाल के तने हुए लंड को अपनी टांगों के बीच में इस तरह स्थापित किया कि वो उसकी चूत पे ठीक से रगड़ सके। रामलाल बहु की चूत की गर्मी अपने लौड़े पर और कन्चन ससुर जी के विशाल लंड की गर्मी अपनी चूत पे महसूस कर रही थी। काफ़ी देर बहु के होंठों का रसपान करने के बाद रामलाल कन्चन से अलग हो गया और थोड़ी दूर से उसकी मस्त जवानी को निहारने लगा। क्या बला की खूबसूरत थी बहु। गोरी गोरी मांसल चूचिआं। पतली कमर और उसके नीचे फैलते हुए विशाल चूतड़। तराशी हुई मांसल जांघों के बीच में घने काले बाल। रामलाल ने आज तक किसी औरत की चूत पे इतने घने और लम्बे बाल नहीं देखे थे। ऐसी जवानी देख के रामलाल मदहोश हो गया।
"ऊफ.. पिता जी अपनी बहु को नंगी करते आपको ज़रा भी शरम नहीं आई। अब ऐसे घूर घूर के क्या देख रहे हैं?"कन्चन शर्मा कर एक हाथ से अपनी चूत और एक हाथ से अपनी चूचिओं को ढकने की नाकामयाब कोशिश करती हुई बोली।
"सच बहु आज तक हमनें इतनी मस्त जवानी नहीं देखी। इस बेचारे लंड को निराश ना करो, थोड़ा सा तो अपनी चूत का रस पिला दो। चलो अगर तुम हमें नहीं देना चाहती हो तो कोई बात नहीं, हम सिर्फ़ लंड का सुपाड़ा तुम्हारी चूत में डाल के निकाल लेंगे। बेचारा थोड़ा सा पानी पी लेगा। अब तो ठीक है ना?"
"ठीक है पिताजी। हमें चोदेंगे तो नहीं ना?" कन्चन जान के चोदने जैसे शब्द का इस्तेमाल कर रही थी। उसके मुंह से ये सुन के रामलाल और भी पागल हुआ जा रहा था।
"नहीं चोदेंगे बहु। तुम्हारी इज़ाज़त के बिना तुम्हें कैसे चोद सकते हैं।"
ये कहते हुए रामलाल ने नंगी कन्चन को अपनी बलिश्ठ बाहों में उठा लिया और बिस्तर पे पटक दिया। अब वो पागलों की तरह बहु के पूरे बदन को चूमने लगा। फिर उसने बहु की मोटी जांघें फैला दी। बहु के जांघों के बीच का नज़ारा देख के उसका कलेजा मुंह को आ गया। घनी लम्बी झांटों के बीच में से बहु की चूत के खुले हुए होंठ झांक रहे थे मानों बर्सों से प्यासे हों। नंगी कन्चन अपने ससुर के सामने टांगें फैलाये पड़ी हुई थी। शर्म के मारे उसने दोनों हाथों से अपना मुंह ढक लिया।
"ऐसे क्या देख रहे हैं पिताजी...?"
"हमें भी तो इस जन्नत का नज़ारा देखने दो बहु। बहु तुमने तो टांगों के बीच में पूरा जंगल उगा रखा है। कभी साफ़ नहीं किया? इतनी खूबसूरत चूत को यों घने बालों के पीछे क्यों छुपा रखा है?"
"इसलिये कि कहीं आपकी नज़र ना लग जाए।"
"आए हाय! बहु तुम्हारी इसी अदा ने तो हमें मार डाला है।"
अब रामलाल से ना रहा गया। उसने बहु की मादक चूत को आगे झुक के चूम लिया। धीरे धीरे वो उसकी चूत चाटने लगा। कन्चन के मुंह से अब सिसकारियां निकल रही थी।
इस्स्स..आअआआआअह....इइइइइस्स्स्स्स....उउंहह। रामलाल की जीभ बहु की चूत के अन्दर बाहर हो रही थी। ऊऊप्फ....आआआह....पिताआआजी...आह...आइइइइई। बहु की चूत बुरी तरह रस छोड़ रही थी। उसकी लम्बी लम्बी झांटें भी भीग गयी थी। बहु वासना की आग में उत्तेजित हो के, चूतड़ उचका उचका के अपनी चूत ससुर जी के मुंह पे रगड़ रही थी। रामलाल का पूरा मुंह बहु की चूत के रस में सन गया। चूत के बाल रामलाल के मुंह में जा रहे थे। अब बहु को चोदने का टाईम आ गया था। रामलाल ने बहु के टांगें मोड़ के उसकी छाती से लगा दी। बहु की चूत उभर आयी थी और मुंह फाड़े लंड का इन्तज़ार कर रही थी। रामलाल ने अपने फौलादी लंड का सुपाड़ा बहु की खुली हुई चूत के मुंह पे टिका दिया और धीरे धीरे दोनों फांकों के बीच में रगड़ने लगा। कन्चन से अब और सहन नहीं हो रहा था।
"इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स.... पिताजी क्यों तंग कर रहे हैं? आपका वो तो हमारी उसका रस पीना चाहता है ना। अब डाल भी दीजिये अन्दर"। कन्चन का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था। जिस लंड के वो रात दिन सपने देखती थी अब उसका मोटा सुपाड़ा कन्चन की चूत के दरवाज़े पे दस्तक दे रहा था।
"बहु तुम्हारी चूत तो बिल्कुल डबल रोटी की तरह फूली हुई है।"
"आपको अच्छी लगी?"
"बहुत।"
"तो फिर ले लीजिये ना..अब डालिये ना प्लीज़..." कन्चन अपने चूतड़ उचका के लंड अपनी चूत में लेने की कोशिश करते हुए बोली। रामलाल ने लंड के सुपाड़े को बहु की चूत की दोनों फांकों के बीच के कटाव में थोड़ा और रगड़ा और फिर हल्का सा धक्का लगा दिया। चूत इतनी गीली थी कि लंड का मोटा सुपाड़ा गुप्प से अन्दर घुस गया।
"आऐइइइई.......आआह पिता जी.....आआह......आअआपका तो बहुत.....आआ मोटाआआआआ है। मैं मर जाउंगी।"
"कुछ नही होगा बहु।" रामलाल ने बहु की चूचिआं मसलते हुए इस बार एक करारा सा धक्का लगा के एक चौथाई लंड अन्दर कर दिया।
"ऊई...माआं...आआअह....आआआइइइइइइई इइइइइइइइइइइइइई........ आआहहहह। पिताजी आप तो आह... हमें चोद रहे हैं। इस्स्स्स..."
"अच्छा नहीं लग रहा तो निकाल लें बहु।"
"बहुत अच्छा लग रहा है...आअआह.......ऊऊह....आपने तो कहा था की आप चोदेंगे नहीं।"
"कहां चोद रहें हैं बहु? इसे सिर्फ़ तुम्हारी चूत का रस पिला दें। बिना चूत में जाए ये रस कैसे पियेगा?"
रामलाल ने लंड को सुपाड़े तक बाहर खींचा और फिर एक ज़बर्दस्त धक्का लगा दिया। इस बार करीब ८ इन्च लंड बहु की चूत में समा गया। कन्चन का दर्द के मारे बुरा हाल था।
"आआआआआआआआआ.................प्लीईईईईईईईईईईज....आआआह. आह.आह...आह ।आह आपका तो बहुत लम्बा है पिताजी। आइइअआह..... हम नहीं झेल पाएंगे। अआ.....आह.....अभी और कितना बाकी है? आह।"
"बस बहु अब तो बहुत थोड़ा सा ही बाहर है।"
"जी हमारी तो फट जाएगी।"
"नहीं फटेगी बहु। तुम तो ऐसे कर रही हो जैसे ज़िन्दगी में पहली बार लंड तुम्हारी चूत में गया हो।"
"जी मर्द का तो कई बार गया है...आआआह......... लेकिन गधे का तो आज पहली बार जा रहा है....मम्मी...आआआआह"
"बस बहु थोड़ा सा और झेल लो। उसके बाद तो हम निकाल ही लेंगे।"
यह कह कर रामलाल ने बहु की चूत के रस में सना हुआ लंड पूरा बाहर खींच लिया और उसकी मोटी मोटी चूचिआं पकड़ के एक बहुत ही ज़ोर का धक्का लगा दिया। इस बार रामलाल का ११ इन्च का मूसल बहु की चूत को बड़ी बेरहमी से चीरता हुआ पूरा जड़ तक अन्दर समा गया। रामलाल के सांड जैसे बड़े बड़े टट्टे बहु के ऊपर की ओर उठे हुए विशाल चूतड़ों से चिपक गये और गांड के छेद में गुद गुदी करने लगे।
"आआआइइइइइइइई......आअह...आअह... पिताजीईईईई........इस्स्स्स्स......मर गयी मैं.. ऊह, सचमुच फट जाएगी हमारी। प्लीज़ हमें छोड़ दीजिये। आपका तो किसी गधी के लिये ही ठीक है।"
"मेरी जान, अब इतना क्यों चिल्ला रही हो? तुम्हारी चूत ने तो हमारा पूरा लंड खा लिया है।"
"जी इतनी बेरहमी से आपने अन्दर जो पेल दिया। इइइस्स्स्स्स्स्स्स...."
रामलाल ने हल्के हल्के धक्के लगाने शुरु कर दिये। कन्चन बिल्कुल मस्त हो गयी थी।
"आआअह्ह्ह... इस्स्स्स्स.....उआआआह....पिताजी...आअह आप तो हमें सचमुच ही चोदने लग गये।"
"कहो तो ना चोदें बहु।"
"सच आप बहुत ही खराब हैं। औरत को फुसला के चोदना तो कोई आपसे सीखे। अपना गधे जैसा वो पूरा हमारे अन्दर पेल दिया, और अब कह रहे हैं, कहो तो ना चोदें। इसे चोदना नहीं तो और क्या कहते हैं?"
"तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा बहु?" रामलाल आधा लंड बाहर निकाल के फिर जड़ तक पेलता हुआ बोला।
"आआई...इस्स्स्स। जी बहुत अच्छा लग रहा है। काश आप हमारे ससुर ना होते ! तो हम आज जी भर के आपसे चुदवाते॥"
"देखो बहु तुम्हें मज़ा आ रहा है और हमने भी ऐसी जवान और खूबसूरत औरत को कभी नहीं चोदा। सिर्फ़ आज चोद लेने दो।"
"सच आप बहुत चालाक हैं। अभी थोड़ी देर पहले आपने हमें बेटी कहा था, औरा अब अपनी बेटी को ही चोद रहे हैं? बोलिये अब भी हम आपकी बेटी हैं ? "
"हां बेटी , तुम अब भी हमारी बेटी हो और हमेशा हमारी बेटी रहोगी।" रामलाल एक ज़ोर का धक्का मारता हुआ बोला।
"आआआह। ।अच्छाआआआ जी! अपनी बेटी को चोदते हुए आपको ज़रा भी शरम नही आ रही? लेकिन पिताजी आपका बहुत मोटा है। हमारी उसको चौड़ी कर देगा। चौड़ी हो गयी तो इन्हें पता लग जाएगा। हम कहीं के नहीं रहेंगे।"
"किसको चौड़ी कर देगा बहु?"
"हटिये भी आपको पता तो है। हमारी जिस चीज़ में ये मूसल घुसा हुआ है उसी को तो चौड़ी करेगा ना।" कन्चन रामलाल के लौड़े को अपनी चूत से दबाती हुई बोली।
"कितनी नादान हो बहु, इतनी जल्दी थोड़े ही चौड़ी हो जाती है। अगर हम तुम्हें दो तीन साल चोदें तो शायद चौड़ी हो जाए।"
"फिर ठीक है, अब तो आपने चोदना शुरु कर ही दिया है तो आज चोद लीजिये। लेकिन आज के बाद फिर कभी नहीं चोदने देंगे। ये पाप है। इन्होनें पूछा चौड़ी कैसे हो गयी तो कह देंगे खेत में जाते वक्त एक गधे ने हमें ज़बर्दस्ती चोद दिया। वैसे ये बात झूठ तो है नहीं। इस वक्त हमें एक गधा ही तो चोद रहा है। "
"सच बहु तुम बातें बहुत मीठी मीठी करती हो॥ आज तो जी भर के चोद लेने दो। ऐसी चूत चोद के तो हम धन्य हो जाएंगे। लेकिन बहु तुम्हें चुदाई सिखाना भी हमारा धर्म है। बोलो सीखोगी न?"
"जी, आप सिखाइये, हम ज़रूर सिखेंगे।"
"देखो बहु चुदवाते वक्त औरत को कोई शरम नहीं करानी चाहिये। बस खुल के रंडी की तरह चुदवाओ।"
"हुमें क्या पता रंडिआं कैसे चुदवाती हैं।"
"बहु रंडिआं चुदवाते वक्त कोई शरम नहीं करती और ना ही अपनी जुबान पे काबू रखती हैं। रंडी सिर्फ़ एक औरत की तरह चुदवाती हई, मर्द से पूरा मज़ा लेती है और मर्द को पूरा मज़ा देती है। बोलो बहु चोदें तुम्हें रंडी की तरह?"
"आअआ...जी, चोदिये हमें बिल्कुल रंडी बना के चोदिये। इइइइइस्स्स्स्स.... आज ये चूत आपकी है।" कन्चन ने अब शर्माने का नाटक बन्द कर दिया और बेशर्मी के साथ चोदने की बातें करने लगी।
"शबाश बहु! ये हुई ना बात, आज हम तुम्हारी चूत की प्यास बुझा के ही दम लेंगे। तब तक चोदेंगे जब तक तुम्हारा दिल नहीं भर जाता।"
"जी हम कब मना कर रहे हैं। चोदिये ना।"कन्चन चूतड़ उचकाती हुई बोली अब रामलाल बहु के नंगे बदन को और मांसल जांघों को सहलाने लगा। धीरे धीरे कन्चन का दर्द दूर होता जा रहा था और उसकी चूत ने फिर से पानी छोड़ना शुरु कर दिया था। रामलाल बहु के रसीले होंठों को चूसने लगा और धीरे धीरे अपना लंड बहु की चूत के अन्दर बाहर करने लगा। कन्चन को अब बहुत मज़ा आ रहा था। गधे जैसे लंड से चुदवाने में औरत को कैसा आनंद मिलता है आज उसे पता चला। रामलाल के मोटे लौड़े ने कन्चन की चूत बुरी तरह चौड़ी कर रखी थी।
"दर्द हो रहा हो तो बाहर निकाल लें बहु?"
"नहीं नहीं पिता जी हमारी चिन्ता ना किजिये बस हमें इतना चोदिये कि आपके लंड की बर्सों की प्यास शान्त हो जाए। आपके लंड की प्यास शान्त हो जाए तो हमें बहुत खुशी होगी।" कन्चन चूतड़ उचका के रामलाल का लौड़ा गुप्प से अपनी चूत में लेती हुई बोली। रामलाल ने बहु की टांगों को और चौड़ा किया और हल्के हल्के धक्के लगने लगा। वो नहीं चाहता था की उसका मूसल बहु की नाज़ुक चूत को फाड़ दे। एक बार बहु की चूत को उसके लम्बे मोटे लौड़े को झेलने की आदत पर जाए फिर तो वो खूब जम के चोदेगा। कन्चन ने ससुरजी की कमर में टांगें लपेट ली और अपने पैर की एड़िओं से उनके चूतड़ को धक्का देने लगी। रामलाल समझ गया की बहु की चूत अब चुदाई के लिये पूरी तरह तैयार है। अब उसने बहु की चूचिआं पकड़ के लंड को सुपाड़े तक बाहर निकाल के जड़ तक अन्दर पेलना शुरु कर दिया। बहु की चूत इतनी ज़्यादा गीली थी की पूरे कमरे में बहु की चूत से फच...फच...फच...फच...फच...फच...फच....फच.....और मुंह से आअआह... इइस्स्स्स..... आऐइइई.... आआह्ह्ह्ह.... आआआअआ.... उइइइइइइई.. आह्ह्ह.... आह.... आह.... आह.... आह का मादक संगीत निकल रहा था।
"बहु ये फच....फच.... की आवाज़ें कहां से आ रही हैं?" रामलाल बहु को चिढ़ाता हुआ बोला।
"इस्स....अआह....पिताजी ये तो अपने मूसल से पूछिये।"
"उस बेचारे को क्या पता बहु?"
"उसे नहीं तो किसे पता होगा पिताजी। इस्स्स....ज़ालिम कितनी बेरहमी से हमारी चूत को मार रहा है।"
"तुम्हारी चूत भी तो बहुत ज़ालिम है बहु। कितने दिनों से हमारी नींद हराम कर रखी थी। ऐसी चूत को चोदने में रहम कैसा? सच इसे तो आज हम फाड़ डालेंगे।" रामलाल ज़ोर ज़ोर से धक्के मारता हुआ बोला।
"हाय ! पिताजी, हमने कब कहा रहम कीजिये। औरत की चूत के साथ ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक ही बार रहम किया जाता है और वो भी अगर चूत कुंवारी हो। उसके बाद अगर रहम किया तो फिर चूत दूसरा लंड ढुंढने लगती है। औरत की चूत तो बेरहमी से ही चोदी जाती है। अगर हमारी चूत ने आपको इतना तंग किया है तो फाड़ डालिये ना इसे। कौन रोक रहा है?"
कन्चन तो अब बिल्कुल रंडिओं की तरह बातें कर रही थी और हर धक्के का जबाब अपने चूतड़ ऊपर उचका के दे रही थी। अब तो ससुर और बहु के अंगों का मिलन हवा में हो रहा था। ससुर जी के धक्के से आधा लंड बहु की चूत में जाता और बहु के धक्के से बाकी बचा हुआ लंड जड़ तक बहु की प्यासी चूत में घुस जाता। कन्चन ने शर्म हया बिल्कुल छोड़ दी थी और खुल के चुदवा रही थी। फच.... फच....फच.... फच.... अआ....आआह। ..इइइइस्स्स्स.........ऊऊइइइमआं ...फच...फच....... बहु की चूत से इतना रस निकल रहा था कि उसकी घनी झांटें भी चूत के रस से चिपचिपा गयी थी। ससुर जी का मूसल जब जड़ तक बहु रानी की चूत में जाता और जब बहु और ससुर की झांटों का मिलन हो जाता तो ससुर जी की झांटें भी बहु की चूत के रस में गीली हो जाती। अब रामलाल पूरा ११ इन्च का लंड बाहर निकाल कर जड़ तक बहु की चूत में पेल रहा था। कन्चन ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि इस उम्र में भी ससुर जी का लंड अपने दोनों बेटों से ज़्यादा तगड़ा और सख्त होगा और उसकी जवान चूत की ये हालत कर देगा। उसकी चूत के चारों तरफ़ चूत के रस में सनी झांटों का जंगल तो मानो एक दलदल बन गया था। कन्चन समझ गयी की ससुर जी चुदाई की कला में बहुत माहिर थे। हों भी क्यों ना। ना जाने कितनी लड़किओं को चोद चुके थे। अब कन्चन से रहा नहीं गया और उसने ससुर जी से पूछ ही लिया,
"आआहह......इस्स्स......आ....पिता जी, सच सच बताइये, आज तक आपने कितनी लड़किओं को चोदा है?"
"क्यों बहु तुम ये क्यों पूछ रही हो?" रामलाल बहु के विशाल चूतड़ों को सहलाता हुआ बोला।
"आप जिस तरह हमें चोद रहे हैं वैसे तो कोई काम कला में माहिर आदमी ही चोद सकता है। और अगर आपने ज़िन्दगी में सिर्फ़ सासु मां को ही चोदा होता तो आप काम कला में इतने माहिर नहीं हो सकते थे।"
"क्यों बहुत मज़ा आ रहा है बहु?"
"जी बहुत! आज तक किसी मर्द ने हमें ऐसे नहीं चोदा।"
"कितने मर्दों से चुदवा चुकी हो बहु?"
"धत! आप तो बड़े वो हैं पिताजी। बताइये ना प्लीज़। कितनी औरतों को चोद चुके हैं?"
रामलाल बहु के रसीले होंठों को चूमता हुआ बोला, "देखो बहु, तुम्हारी सासु मां तो अपनी चूत देती नहीं थी। हमारी जवानी भी वैसे ही बर्बाद हो रही थी जैसे तुम्हारी जवानी बर्बाद हो रही है। हमें लाचार हो कर अपने बदन की प्यास बुझाने के लिये खेतों में काम करने वाली औरतों का सहारा लेना पड़ा।"
"हाय....तो आपने खेतों में काम करने वाली औरतों को चोदा? कितनों को चोदा?" कन्चन ज़ोर से चूतड़ उचका के ससुर जी का लंड अपनी चूत में पेलते हुए बोली।
"ये ही कोई बीस औरतों को।"
"हाय राम! बीस को! उनमें से कुन्वारी कितनी थी?"
"बहु लड़की कुन्वारी हो तो इसका मतलब ये नहीं की उसकी चूत भी कुन्वारी है।"
"जी हमारा मतलब है उनमे से कितनों की चूत कुन्वारी थी।"
"तीन की।"
"सच, फाड़ ही डाली होगी आपके इस मूसल ने।"
"नहीं बहु ऐसा नहीं है। तुम्हारी सासु मां की जो हालत हुई थी उसके बाद से हम बहुत सम्भल गये थे। लेकिन फिर भी बहुत खून खराबा हो गया था। बेचारी थी भी १७ या १८ साल की। इतना ध्यान से चोदने के बाद भी तीनों ही बेहोश हो गयी थी।"
"उसके बाद से तो उन्होनें आपसे कभी नहीं चुदवायी होगी।"
"नहीं बहु उनमें से एक ही ऐसी थी जिसे हमने अगले चार साल तक खूब चोदा।"
"कौन थी वो पिताजी?" कन्चन जानते हुए भी अन्जान बन रही थी।
"देखो बहु ये राज़ हम आज सिर्फ़ तुम ही को बता रहे हैं। वो हमारी साली यानी तुम्हारी सासु मां की सगी बहन थी।"
"हाय राम! पिताजी आपने अपनी साली तक को नहीं छोड़ा? चार साल में तो चौड़ी हो गयी होगी उसकी चूत।" कन्चन अपनी चूत से रामलाल का लंड दबाते हुए बोली।
"उसे तो सिर्फ़ चार साल चोदा था बहु, लेकिन अगर तुम चाहोगी तो हम तुम्हें ज़िन्दगी भर चोद सकते हैं। अपनी जवानी बर्बाद ना करो"
"बर्बाद क्यों होगी हमारी जवानी। अब आपके हवाले जो कर दी है। ज़िन्दगी भर चोद के तो आप का ये गधे जैसा मूसल हमारी चूत को कुआं बना देगा।" कन्चन बेशर्मी से चूतड़ उचकती हुई बोली। ससुर जी को बहु को चोदते अब करीब एक घन्टा हो चला था। कन्चन के पसीने छूत गये थे लेकिन रामलाल झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।
अचानक रामलाल बहु की चूत से लंड बाहर निकालता हुआ बोला, "बहु अब हम तुम्हें एक दूसरी मुद्रा में चोदेंगे।"
"वो कैसे पिताजी?"कन्चन रामलाल के मोटे, काले, चूत के रस में चमकते हुए लंड का भयन्कर रूप देख के कांप उठी।
"तुमने कुत्ते और कुतिआ को तो चुदाई करते देखा है?"
"जी..."
"बुस कुतिआ बन जाओ। हम तुम्हारी चूत कुत्ते की तरह पीछे से चोदेंगे।"
"हाय राम! पिता जी...! अपनी बहु को पहले रंडी और अब कुतिआ भी बन डाला।"
"कभी कुतिआ बन के चुदवाई हो बहु?"
"इन्होनें तो हमें औरत की तरह भी नहीं चोदा, कुतिआ बनाना तो दूर की बात है। लेकिन आज हम आपकी कुतिआ ज़रूर बनेंगे।" ये कह कर कन्चन कुतिआ बन गयी। उसने अपनी छाती बिस्तर पे टिका दी और घुटनों के बल हो कर टांगें चौड़ी कर ली और बड़े ही मादक ढंग से अपने विशाल चूतड़ों को ऊपर की ओर उचका दिया। इस मुद्रा में बहु के विशाल चूतड़ों और मांसल जांघों के बीच में से घनी झांटों के बीच बहु की फूली हुई चूत साफ़ नज़र आ रही थी। रामलाल के मोटे लंड की चुदाई के कारण चूत का मुंह खुल गया था और बहुत ही सूजी हुई सी लग रही थी। बहु के गोरे गोरे मोटे मोटे चूतड़ और उनके बीच से झांकता गुलाबी छेद देख कर तो रामलाल के मुंह में पानी आ गया। रामलाल से ना रहा गया। उसने अपने मूसल का सुपाड़ा बहु की चूत के खुले हुए मुंह पे टिका दिया और एक ज़बर्दस्त धक्का लगा दिया। चूत इतनी गीली थी कि एक ही धक्के में ११ इन्च लम्बा लंड जड़ तक बहु की चूत में समा गया।
"आआआआह्ह्ह्ह्ह.....उइइइइइइई माआआआआ...... हाय राम..पिता जी..... मार डाला। इस्स्स्स्स्स्स............कुत्ते भी इतने ही बेरहम होते हैं क्या?"
"हां मेरी जान, तभी तो कुतिआ को मज़ा आता है।"
रामलाल ने अब बहु के चूतड़ पकड़ के ज़ोर ज़ोर से धक्के मारना शुरु कर दिया था। बहु भी चूतड़ उचका उचका के ससुरजी के धक्कों का जबाब दे रही थी। इस मुद्रा में बहु के मुहं और चूत दोनों ही और भी ज़्यादा आवाज़ कर रहे थे। बहु अपने चूतड़ पीछे की ओर उचका उचका के ससुर जी के लंड का स्वागत कर रही थी। बहु की चूत का रस अब रामलाल के सांड की तरह लटकते टट्टों को पूरी तरह गीला कर चुका था। कन्चन अब तक दो बार झड़ चुकी थी लेकिन रामलाल झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।
कन्चन ने अपने चूतड़ ज़ोर से पीछे की ओर उचका के रामलाल का मूसल जड़ तक अपनी चूत में पेलते हुए पूछा, "पिताजी आप हमें कुतिआ बना के चोद रहे हैं, कहीं चुदाई के बाद कुत्ते की तरह आपका लंड हमारी चूत में तो नहीं फंसा रह जाएगा?"
"फंसा रह भी गया तो क्या हो जाएगा बहु?"
"हमें तो कुछ नहीं पिताजी, लेकिन जब सासु मां शाम को वापस आके आपको हमारे ऊपर कुत्ते की तरह चढ़ा हुआ देखेंगी और आपका मूसल हमारी चूत में फंसा हुआ देखेंगी तो आपके पास क्या जवाब होगा?"
"कह देंगे की एक कुत्ता तुम्हारी बहु को चोदने की कोशिश कर रहा था। इससे पहले की वो तुम्हारी बहु की चूत में अपना लंड पेलता, उस कुत्ते से बचाने के लिये हमें अपना लंड बहु की चूत में पेलना पड़ा। आखिर जो कुछ किया बहु को बचाने के लिये ही तो किया।"
"अच्छा जी! और अगर वो पूछें की बहु नंगी कैसे हो गयी तो?"
"तो क्या? कह देंगे बहु नहाने जा रही थी कि एक बहुत बड़ा कुत्ता बहु को नंगी देख के खिड़की से खूद के अन्दर आ गया और उसे गिरा के उसके ऊपर चढ़ कर चोदने की कोशिश करने लगा।"
"और वो पूछें की आपको अपना लंड हमारी चूत में पेलने की क्या ज़रूरत थी, तो?"
"अरे भई ये तो बहुत सिम्पल बात है। अगर बहु की चूत में लंड पेल के हमने बहु का छेद बन्द ना किया होता तो वो कुत्ता उस छेद में अपना लंड पेल देता। हमने तो सिर्फ़ अपने घर की इज़्ज़त बचा ली।"
"हां... आपके पास तो सब चीज़ों का जबाब है।" कन्चन अपने चूतड़ उचका के रामलाल का पूरा लंड अपनी चूत में लेती हुई बोली।
अब रामलाल ने कन्चन के चूतड़ पकड़ के ज़ोर ज़ोर से धक्के मारना शुरु कर दिया। उसने बहु के गोरे गोरे चूतड़ों को दोनों हाथों में पकड़ के फैला दिया था ताकि उनके बीच में गुलाबी रंग के छोटे से छेद के दर्शन कर सके। आखिर बहु के इन विशाल चूतड़ों ने ही तो उसकी नींद हराम कर रखी थी। बहु का गुलाबी छेद देख कर उसके मुहं में पानी आ रहा था। उसका मन कर रहा था की नीचे झुक के उस गुलाबी छेद को चूम ले। रामलाल जानता था कि यहां बहु की गांड मारना खतरे से खाली नहीं था। बहु का चिल्लाना सुन के पूरा मुहल्ला जमा हो सकता था। अगर उसका मूसल नहीं झेल पायी और बेहोश हो गयी तुब तो और भी मुसीबत हो जाएगी। लेकिन उसने सोच लिया था कि वो बहु को खेतों में ले जा के उसकी गांड ज़रूर मारेगा।
उधर कन्चन बड़ी अच्छी तरह समझ रही थी कि जिस तरह ससुर जी ने उसके चूतड़ों को फैला रखा था, उन्हें उसकी गांड के दर्शन हो रहे होंगे। उसके सेक्सी चूतड़ों को देख के मर्द के दिल में क्या होता है वो भी वो अच्छी तरह जानती थी। वो मन ही मन सोच रही थी कि ससुर जी कभी ना कभी तो उसकी गांड ज़रूर मारेंगे। इतना मोटा और लम्बा मूसल तो उसकी गांड फाड़ ही डालेगा। रामलाल से अब और नहीं रहा गया। उसने अपना ११ इन्च का लंड बहु की चूत से बाहर खींच लिया और नीचे झुक के अपना मुंह बहु के फैले हुए विशाल चूतड़ों के बीच में दे दिया। रामलाल पागलों की तरह बहु की गांड के गुलाबी छेद को चाटने लगा और अपनी जीभ कभी कभी छेद के अन्दर घुसेड़ देता।
"इस्स्स्स.........आआआह.......आआअहहहह.........इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स पिता जी ये आप क्या कर रहे हैं? वहां तो गंदा होता है।"
"चुदाई के खेल में कुछ गंदा नहीं होता । तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा बहु?"
"जी अच्छा तो बहुत लग रहा है, लेकिन...."
"लेकिन क्या? मज़ा तो आ रहा है ना? सच तुम्हारी गांड बहुत ही स्वादिष्ट है।"
"हटिये भी पिताजी, वो कैसे स्वादिष्ट हो सकती है? वहां से तो..."
"हमें पता है बहु वहां से तुम क्या करती हो। आज तक इस छेद से तुमने सिर्फ़ बाहर निकालने का काम किया है, कुछ अन्दर नहीं लिया।"
"हाय राम! उस छेद से अन्दर क्या लिया जाता है?"
"बहु जब ये लंड तुम्हारे पीछे वाले छेद में जाएगा तुब देखना कितना मज़ा आएगा।"
"हाय राम! पीछे वाले छेद में भी लंड डाला जाता है क्या?" कन्चन बनती हुई बोली।
"हां बहु, औरत के तीन छेद होते हैं और तीनों ही चोदे जाते हैं। औरत की सिर्फ़ चूत ही नहीं गांड भी मारी जाती है। औरत को मर्द का लंड भी चूसना चहिये। जिस औरत के तीनों छेदों में मर्द का लंड ना गया हो वो अपनी जवानी का सिर्फ़ आधा ही मज़ा ले पाती है।"
"बाप रे ! ये गधे जैसा लंड उस छोटे से छेद में कैसे जा सकता है? सच ये तो हमारे छेद को फाड़ ही डालेगा। ना बाबा ना हमें नहीं लेना ऐसा मज़ा।"
"अरे बहु इतना घबराती क्यों हो? हम तो सिर्फ़ तुम्हारे इस गुलाबी छेद को प्यार कर रहे हैं, तुम्हारी गांड तो नहीं मार रहे।"
"आअहह बहुत मज़ा आ रहा है। आअह...आआइइइइई... जीभ अन्दर डाल दीजिये, प्लीज़....."
रामलाल बड़ी तेज़ी से अपनी जीभ बहु की गांड के अन्दर बाहर कर रहा था और उस गुलाबी छेद के चारों ओर चाट रहा था। कन्चन अब और नहीं सह पायी और एक बार फिर झड़ गयी।
"पिता जी हम तो अब तक तीन बार झड़ चुके हैं और आप हैं की झड़ने का नाम ही नहीं ले रहे। अब प्लीज़ हमें चोदिये और हमारी प्यासी चूत को अपने वीर्य से भर दीजिये।"
"ठीक है बहु जैसा तुम चाहो। आज पहले तुम्हारी प्यासी चूत को तृप्त कर दें। बाद में तो तुम्हें काम कला के कई गुर सिखाने हैं।"
"ठीक है गुरु जी! अब तो प्लीज़ हमारी चूत चोदिये और इसकी बरसों की प्यास बुझा दीजिये। हम कहीं भाग तो रहे नहीं, रोज़ आप से चुदाई के नये नये तरीके सीखेंगे।"
रामलाल ने बहु की गांड में से अपनी जीभ निकाली और फिर से अपने लंड का सुपाड़ा कुतिआ बनी बहु की फूली हुई चूत पे टिका दिया और एक ही धक्के में फच की आवाज़ के साथ जड़ तक पेल दिया। अब रामलाल बहु के दोनों चूतड़ों को पकड़ के ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा। करीब बीस मिनट तक बहु की चूत की अपने मूसल से पिटाई करने के बाद बरसों से अपने बाल्स में इकट्ठा किया हुआ वीर्य बहु की चूत में उड़ेल दिया। बहु को तो जैसे नशा सा आ रहा था। उसकी चूत ससुर जी के गरमा गरम वीर्य से लबालब भरी गयी थी और अब तो वीर्य चूत में से निकल कर बिस्तर पे भी टपक रहा था। रामलाल ने बहु की चूत में से अपना मूसल बाहर खींचा और बहु के बगल में लेट गया। बहु भी निढाल हो के बिस्तर पे लुढ़क गयी थी। तीन घन्टे से चल रही इस भयन्कर चुदाई से उसके अंग अंग में मीठा मीठा दर्द हो रहा था।
रामलाल ने बहु से पूछा, "बहु, कुछ शान्ति मिली?"
"जी, आज तो तृप्त हो गयी।"
"चलो उठो, तुम्हारी सासु मां के आने का टाईम हो रहा है। नहा धो लो, कहीं उन्हें शक ना हो जाए।"
"जी ठीक है।"
कन्चन बिस्तर से उठी और गिरते गिरते बची। वीर्य उसकी चूत से निकल के जांघों पे बह रहा था। उसकी टांगें कांप रही थी। रामलाल ने जल्दी से उठ के बहु को सहारा दिया। बहु तो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। रामलाल बहु को ले के बाथरूम में गया और उसे एक स्टूल पे बैठा दिया। उसके बाद उसने बहु की टांगें फैला दी और पानी से चूत की सफ़ाई करने लगा। बहु की घनी झांटें ससुर के वीर्य में सनी हुई थी। कन्चन को अपनी सुहाग रात याद आ गयी जब इसी तरह उसके पति ने उसकी चूत की सफ़ाई की थी। आज वही काम ससुर जी कर रहे थे। फर्क सिर्फ़ इतना था कि सुहाग रात को उसकी कुंवारी चूत की दुर्दशा हुई थी और आज ससुर जी के मूसल ने उसकी कई बार चुदी हुई चूत की भी वैसी ही दुर्दशा कर दी जैसी सुहाग रात को हुई थी। चूत साफ़ करने के बाद ससुरजी ने कन्चन के ऊपर पानी डाल के उसे नहलाना शुरु कर दिया। ठन्डा ठन्डा पानी पड़ने से कन्चन के शरीर में जान आई। कन्चन ने भी ससुर जी के लंड को पानी से साफ़ किया जो उसकी चूत के रस में बुरी तरह सना हुआ था। इस तरह बहु और ससुर ने एक दूसरे को नहलाया।
रामलाल ने उसके बाद कन्चन को कहा, "बहु जाओ सासु मां के आने से पहले थोड़ा आराम कर लो।"
"ठीक है पिता जी।" कन्चन अपने कमरे में चली गयी। बिस्तर में लेटते ही उसकी आंख लग गयी। तीन घन्टे की चुदाई से वो बहुत थक गयी थी। सासु मां के आने से पहले वो करीब एक घंटा घोड़े बेच के सोयी।
समाप्त
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