कंचन भाग के अंडर बाथरूम में गयी और मूतने लगी. नीलम ने उसे बताया था और उसने भी देखा था कि पापा ने कैसे मम्मी की पेशाब की हुई चूत को चॅटा था. मूतने के बाद उसने पॅंटी ऊपेर चढ़ा ली. अपनी टाँगों के बीच में देखा तो मुस्कुरा दी. पॅंटी पे पेशाब का बड़ा सा दाग लग गया था और उस जगह से पॅंटी गीली हो गयी थी.
शर्मा जी बेसब्री से बेटी के आने का इंतज़ार करने लगे. बिटिया की चूत में फँसी पॅंटी अब भी उनकी आखों के सामने घूम रही थी. बिटिया की चूत में से इस वक़्त निकलती हुई पेशाब की धार की कल्पना मात्र से उनका लंड हरकत करने लगा. इतने में कंचन पेशाब करके लॉन में आ गयी,
“चलिए पापा, मैं तैयार हूँ. लेकिन मैं सामने से आपके कंधों पे बैठूँगी ताकि गिरने लगूँ तो आप संभाल लेना.”
“नहीं गिरगी बेटी. खैर जैसे चाहो बैठो.”
शर्मा जी नीचे बैठे और कंचन सामने उनके कंधों के दोनो ओर टाँगें डाल कर बैठ गयी. अब तो शर्मा जी का मुँह बेटी की चूत से सटा हुआ था लेकिन स्कर्ट के ऊपर से. वो खड़े हो गये. कंचन बोली,
“ पापू, थोड़ा ऊपर उठाइए ना.. हाथ नहीं पहुँच रहा.”
शर्मा जी को बेटी को ऊपर की ओर उठाने के लिए उसके चूतरो को पकड़ना पड़ा. जैसे ही उन्होने बिटिया के चूतरो पर हाथ रखा उन्हें महसूस हुआ कि उनका आधा हाथ बेटी की पॅंटी पर और आधा हाथ उसके नंगे चूतरो पर था. उन्हें कुच्छ दिख वैसे भी नहीं रहा था क्योंकि उनका मुँह तो बेटी की टाँगों के बीच में दबा हुआ था.
“और थोड़ा ऊपर उठाओ, पापा.” कंचन चिल्लाई. शर्मा जी ने बेटी के चूतेर पकड़ कर उसे और ऊपर उठा दिया. स्कर्ट तो छ्होटी सी थी ही. कंचन के और ऊपर होने से उसकी स्कर्ट शर्मा जी के सिर के ऊपर आ गयी.
अब तो शर्मा जी का सिर बेटी की स्कर्ट के अंडर छुप गया था और उनका मुँह ठीक बेटी की चूत पर आ गया. अचानक शर्मा जी की नाक में बेटी की चूत की तेज़ महक गयी. आज तो उसकी चूत की खुश्बू बहुत तेज़ थी. इसका एक कारण था. कंचन ने धूलि हुई पॅंटी पहनने के बजाए जान के कल वाली ही पॅंटी पहनी हुई थी. दो दिन से पहनी हुई पॅंटी में से चूत की ज़ोरदार गंध तो आनी ही थी. शर्मा जी तो बिटिया की कुँवारी चूत की ज़ोरदार गंध से मदहोश हो गये. शर्मा जी को अपने होंठों पे गीलापन महसूस हुआ और वो समझ गये कि ये तो बेटी की पेशाब का गीलापन है क्योंकि अभी अभी तो वो पेशाब करके आई थी. अब तो शर्मा जी अपना आपा खो बैठे. उन्होने बेटी को और ऊपर उठाने के बहाने उसके चूतेर पकड़ के अपना मुँह बेटी की चूत में ज़ोर से दबा दिया. शर्मा जी ने अपने होंठ थोड़े से खोल दिए और बिटिया की पॅंटी में कसी फूली हुई चूत उनके मुँह में आ गयी. बिटिया की चूत की तेज़ स्मेल उनकी नाक में जा रही थी और उनका लंड अंडरवेर फाड़ कर बाहर निकलने को हो रहा था. उधेर कंचन को भी अपनी चूत पर पापा की गरम गरम साँसे महसूस हो रही थी. वो भी बास्केट ठीक करने के बहाने अपनी चूत पापा के मुँह पर रगड़ रही थी. नीलम ने फिर से मूवी कॅमरा शर्मा जी के लंड के उभार पे फोकस कर दिया. शर्मा जी को तो पता ही नहीं था कि नीलम उनका वीडियो बना रही है क्योंकि उनका मुँह तो बिटिया की स्कर्ट के नीचे च्छूपा हुआ उसकी चूत का आनंद ले रहा था. अब तो कंचन की पॅंटी उसके चूत के रस से गीली होने लगी थी. उसे डर था कि कहीं पापा को पता ना लग जाए. आख़िरी बार ज़ोर से पापा के मुँह में चूत को रगड़ती हुई बोली,
“ पापा ठीक हो गया नीचे उतारिये.”
शर्मा जी ने भी आख़िरी बार बेटी की पूरी चूत को मुँह में ले कर चूमा और बेटी को नीचे उतार दिया. शर्मा जी का चेहरा लाल हो रहा था और बिटिया के पेशाब से उनके होंठ नमकीन हो रहे थे. उनकी पॅंट तो ऐसे फूल गयी थी जैसे अंडरवेर पहना ही ना हो. शर्मा जी जल्दी से दूसरी ओर घूम गये और अंडर जाते हुए बोले,
“ चलो बच्चो खाना खा लो. कंचन बेटी नीलम को भी ले आओ.”
“जी पापू.” दोनो लड़कियाँ भी अंडर चली गयी. लेकिन शर्मा जी का ध्यान खाने में कहाँ. उनके मुँह में तो बिटिया की चूत का स्वाद था. खाना खा के वो उस स्वाद को खराब नहीं करना चाहते थे. जैसे ही शर्मा जी ऑफीस गये, दोनो सहेलियाँ वीडियो देखने लगी जिसमे शर्मा जी के लंड का उभार सॉफ नज़र आ रहा था. कंचन ये सोच कर बहुत खुश थी कि उसके पापा का लंड उसकी वजह से खड़ा हो गया था.
नीलम उसके चूतरो पे हाथ फेरते हुए बोली,
“हाई कंचन आज तो तेरे पापा ने तेरी चूत का स्वाद भी चख लिया. अब देख वो तेरे कैसे दीवाने हो जाते हैं.”
“हट पागल! तू तो सुचमुच बड़ी खराब है.”
“हाई मेरी जान, ये बता तुझे कैसा लगा?”
“हट ना.. मुझे तो शरम आती है.”
“हाई, अब कैसी शरम? जब अपने पापा के मुँह में चूत दे दी थी टब तो शरम आई नहीं. बता नाअ… मज़ा आया?” नीलम कंचन की चूत दबाती हुई बोली.
“इसस्स.. ये क्या कर रही है? छोड़ ना मेरी चूत. सच बताउ? आज ज़िंदगी में पहली बार किसी मरद के होंठ मेरी चूत पे लगे. ऊफ़! पापा ने मेरी चूत को काट क्यों नहीं लिया?”
“काटेंगे, काटेंगे. आज तो पहला दिन था. बिटिया की चूत मुँह में ले के उनकी भी नींद हराम हो जाएगी. अभी देख आगे आगे क्या होता है.” नीलम पॅंटी के ऊपर से ही कंचन की चूत मसल्ने लगी. कंचन की चूत रस छोड़ रही थी और उसकी पॅंटी बुरी तरह गीली होने लगी.
“इसस्सस्स…..आआईयईई… नीलम! छोड़ नाअ.. देख मेरी पॅंटी खराब हो रही है.”
“तेरी पॅंटी ही तो खराब करनी है. आज इस पॅंटी को पापा के बाथरूम में छोड़ देना. कल तक अपनी पॅंटी को पहचान नहीं पाएगी.”
अब तो कंचन का भी साहस बढ़ गया था. उसे अपने पापा को तड़पाने में बड़ा मज़ा आने लगा था. लेकिन वो पापा का लंड भी महसूस करना चाहती थी. उस दिन जब शाम को शर्मा जी ऑफीस से वापस आए तो कंचन अब भी उसी स्कूल की छ्होटी सी स्कर्ट में थी.
“अरे बेटी तुमने अभी तक कपड़े नहीं बदले?”
“नीलम अभी अभी गयी है. हम दोनो पढ़ रहे थे.”
“अच्छा बेटी मैं ज़रा नहा के आता हूँ.”
“नहीं पाप्पो आप बाद में जाना, मैं एक मिनिट में नहा के आती हूँ.”
“बिटिया तुम तो बहुत टाइम लगाती हो.”
“आप देख लेना मैं बस गयी और आई.”
“ठीक है जल्दी जाओ.”
कंचन ये ही तो चाहती थी. बाथरूम में जाते ही कंचन ने पेशाब किया और पॅंटी फिर से ऊपर चढ़ा के पेशाब का दाग लगा दिया. फिर उसने सारे कपड़े उतार दिए. पॅंटी को उतार कर उसने दरवाज़े के पीछे लगे हुक पर टाँग दिया. पॅंटी पर पेशाब का दाग सॉफ नज़र आ रहा था. कंचन ने देखा कि पॅंटी पे उसकी झांतों का एक बॉल भी चिपका हुआ है. कंचन ने अपनी चूत रगड़ कर तीन चार बाल और निकाल कर पॅंटी पे चिपका दिए. फिर वो जल्दी से नहा के बाहर निकल आई,
“जाइए पाप्पो. मैं नहा चुकी.”
शर्मा जी भी नहाने बाथरूम में चले गये. जैसे ही उन्होने बाथरूम का दरवाज़ा बन्द किया उनकी नज़र उसके पीछे हुक पर तंगी बेटी की पॅंटी पर गयी. शरमाजी का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा. आज करीब साल भर के बाद उन्हें बिटिया की पॅंटी इस तरह तंगी हुई मिली थी. सवेरे इसी पॅंटी में कसी हुई बिटिया की चूत उनके मुँह में थी. शर्मा जी ने काँपते हुए हाथो से बेटी की पॅंटी को अपने हाथ में लिया और पॅंटी के मुलायम कपड़े पर हाथ फेरने लगे. तभी शर्मा जी की नज़र पॅंटी पे चिपके हुए बिटिया की झांतों के बालों पे गयी. शर्मा जी का लॉडा फंफना गया. उन्होने जी भर के बिटिया की पॅंटी को चूमा और चाता. फिर जहाँ पेशाब का दाग लगा था उसे अपने तने हुआ लॉड के सुपारे पे रख उसकी चूत का गीलापन महसूस करने लगे. बिटिया की चूत की कल्पना करते हुए पॅंटी को अपने लंड पे रगड़ते हुए उन्होने ढेर सारा वीर्य उसकी पॅंटी में उंड़ेल दिया. जब रात को शर्मा जी सो गये तो कंचन चुपके से बाथरूम में गयी और अपनी पॅंटी देख कर उसका दिल धक धक करने लगे.
वीर्य तो वो पहले भी देख चुकी थी मम्मी की चूत और गांद में से बाहर बहता हुआ लेकिन आज ज़िंदगी में पहली बार मरद के वीर्य को हाथ लगा के देखा था. कंचन ने अपनी मम्मी को पापा का वीर्य पीते हुए देखा था. उससे ना रहा गया और उसने अपनी पॅंटी में लगे हुए वीर्य को चाट लिया. पापा का वीर्य चाटते हुए उसे बहुत खुशी हो रही थी क्योंकि ये अनुभव अभी तक सिर्फ़ उसकी मम्मी ने ही किया था. कंचन को अब अपनी मम्मी से थोड़ी थोड़ी जलन सी होने लगी थी.
नीलम अब कंचन के पीछे पड़ गयी की जिस दिन मम्मी वापस आने वाली हो उस दिन भी वो कंचन के साथ रहना चाहती थी. नीलम को पता था कि जिस दिन मम्मी वापस आएगी उस दिन फिर से सारी रात चुदाई का नज़ारा देखने को मिलेगा. वही हुआ. जिस दिन मम्मी वापस आई उस रात सिर दर्द का बहाना बना कर जल्दी ही सोने चली गयी. कंचन को लगा कि आज तो चुदाई देखने नहीं मिलेगी, पर नीलम बोली, “कंचन तू इतनी भोली क्यों है? सिर दर्द का तो बहाना है. तेरी मम्मी चुदवाने के लिए उतावली हो रही है.” हम दोनो जल्दी से अपने कमरे में पहुँच गये. नीलम की बात बिल्कुल सच निकली. मम्मी बिस्तेर पर चादर ओढ़ के लेटी हुई थी. जैसे ही पापा अंडर आए, बोली,
“ कितनी देर से इंतज़ार कर रही हूँ ? आ भी जाइए.”
पापा ने मम्मी की चादर उतार दी. मम्मी एकदम नंगी थी. उसके बाद का नज़ारा तो कंचन की ज़िंदगी का एक और यादगार नज़ारा बन गया. पापा ने मम्मी को पूरी रात कयि नयी नयी मुद्राओं में चोदा. नीलम और कंचन ने एक बार फिर से एक दूसरे की चूत चाट के अपनी प्यास को ठंडा किया. इसके बाद मम्मी पापा की चुदाई का नज़ारा एक बार और देखने को मिला . इतने में शर्मा जी ने एक कमरा घर के ऊपर बनवा लिया था. पापा मम्मी उस कमरे में शिफ्ट हो गये. ये कमरा कंचन के कमरे के ठीक ऊपर था. अब तो कभी कभी जब मम्मी ज़्यादा जोश में होती थी तभी उनके मुँह से चुदाई की आवाज़ें नीचे तक आती थी. पापा मम्मी की चुदाई देखने के बाद से कंचन की कामुकता बढ़ती जा रही थी. नीलम ने भी कंचन की चूत पर हाथ फेर फेर कर तंग कर रखा था. नीलम तो सुधीर से चुदवा कर अपनी प्यास बुझा लेती लेकिन कंचन तड़पति रह जाती. कंचन को अब एक मोटे लंबे लॉड की सख़्त ज़रूरत महसूस होने लगी थी. पापा का तना हुआ लंड अक्सर उसकी आँखों के सामने घूम जाता. कंचन की अब एक ही तमन्ना थी कि उसकी शादी ऐसे मर्द से हो जिसका लंड मोटा तगड़ा हो और उसे चोदने का शोक हो. जब से अपने भाई विकी के लंड के बारे में सुना था तब से उसके लंड की कल्पना से ही कंचन की चूत गीली हो जाती. अब जब भी नीलम कंचन के घर आती वो दोनो घंटों एक दूसरे के बदन के साथ खेलते और एक दूसरे की चूत चाटते. बड़ा मज़ा आता था, लेकिन वो मज़ा तो नहीं आ सकता था जो एक मरद के साथ आता है.
आख़िर मरद का मज़ा कंचन को शादी के बाद ही मिला.
दोस्तो यहाँ से कहानी अपनी वास्विकता मे आती है
रात के 12 बज रहे थे. मम्मी मेरे कमरे में नींद की गोली खा कर बेख़बर सो रही थी. लाइट आने का कोई अंदेशा नहीं था. बाहर तूफान अब भी ज़ोरों पर था. इधर मेरे दिल और दिमाग़ पर भी बचपन की यादों ने ज़ोर का तूफान ला दिया था. इतने में पापा के आने आवाज़ सुनाई दी. मैं झट से कॅंडल जला के मम्मी के बिस्तेर पे पेट के बल लेट गयी और चादर से मुँह धक लिया, लेकिन पेटिकोट को चूतरो तक ऊपर चढ़ा लिया. मेरी मांसल जांघें बिल्कुल नंगी थी. ध्यान से देखने वाले को जांघों के बीच से झँकति हुई गुलाबी पॅंटी की झलक भी मिल जाती. पापा कमरे में आए. शायद काफ़ी पी रखी थी. लरखरा रहे थे. अंडर आके उन्होने कपड़े उतारने शुरू किए. मेरे मन में एक बार आया की कह दूं मम्मी मेरे कमरे में सो रही है. मैं इसी उधेर बुन में थी कि पापा बिल्कुल नंगे हो गये. अब तो बहुत देर हो चुकी थी. अब तो जो होगा देखा जाएगा. मेरी नज़र उनके लॉड पे पर गयी. बिल्कुल सिकुदा हुआ नहीं था लेकिन खड़ा भी नहीं था. कॅंडल की रोशनी में बहुत मोटा और डरावना लग रहा था. बाप रे ! खड़ा हो के तो बहुत ही मोटा हो जाएगा. आज कयि बरसों के बाद पापा के लंड को देखा था. पहले से कहीं ज़्यादा काला और मोटा लग रहा था. पापा ने एक नज़र मेरी तरफ डाली. मेरी गोरी गोरी मांसल नंगी जांघें कॅंडल की लाइट में चमक रही थी. पापा थोड़ी देर तक मेरी नंगी टाँगों को देखते रहे. उनके लंड ने हरकत शुरू कर दी थी. उन्होने मेरी नंगी जांघों की ओर देख कर धीरे धीरे अपने लंड को दो तीन बार सहलाया और फिर बाथरूम में पेशाब करने चले गये. मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गयी. वापस आ के उन्होने मेरी ओर ललचाई नज़रों से देखा. उनका लंड थोड़ा और बड़ा हो चुक्का था. लंड में तनाव आना शुरू हो गया था. उनका इरादा सॉफ था. फिर उन्होने कॅंडल को बुझा दिया और नंगे ही बिस्तेर पे आ गये और मुझसे चिपक गये. मेरी पीठ उनकी ओर थी. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा. धीरे धीरे मेरे चूतरो को सहलाने लगे. उनका लंड तन चुका था और मेरे चूतरो की दरार में चुभ रहा था. मैं गहरी नींद में होने का बहाना कर रही थी. पापा ने मेरा पेटिकोट मेरे चूतरो के ऊपेर खिसका दिया. अब तो मेरे विशाल नितुंबों की इज़्ज़त मेरी छ्होटी सी पॅंटी के हाथ में थी. पेटिकोट ऊपर करके पॅंटी के ऊपेर से ही मेरे चूतरो को सहलाते हुए बोले,
“कविता, सो गयी क्या? इतना तो मत तडपाओ मेरी जान. आज बरसों बाद तो तुम्हें चोदने का मौका मिला है.” मैं चुप रही. अब पापा ने मेरी टाँगों के बीच हाथ सरका दिया और पॅंटी के ऊपेर से मेरी चूत सहलाते हुए बोले,
‘क्या बात है मेरी जान आज तो तुम्हारी चूत कुच्छ ज़्यादा ही फूली हुई लग रही है?’ मैं तो बिल्कुल चुपचाप पड़ी रही. मेरी चूत अब गीली होने लगी थी. कोई जबाब ना मिला तो बोले,
“ समझा, बहुत नाराज़ लग रही हो. माफ़ कर दो मेरी जान, थोरी देर हो गयी. देखो ना ये लॉडा तुम्हारे लिए कैसा पागल हो रहा है.” यह कहते हुए उन्होने अपना तना हुआ लॉडा मेरे चूतरो से सटा दिया और एक हाथ सामने डाल कर धीरे धीरे मेरी चूचियाँ सहलाने लगे. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा. मेरी हिम्मत टूट रही थी लेकिन अब कोई चारा नहीं था. धीरे धीरे पापा ने मेरे ब्लाउस के बटन खोलने शुरू कर दिए. ब्रा तो पहना नहीं था. पीठ नंगी हो गयी. उनके मोटे लॉड ने मेरी पॅंटी को चूतरो की दरार में धकेल दिया था. मेरी चूत बुरी तरह से गीली हो गयी थी. अब पापा ने मेरी बारी बारी नंगी चूचिओ को सहलाना शुरू कर दिया. मेरे निपल तन गये थे. अचानक पापा ने मेरी चूचिओ को पकड़ कर ज़ोर से दबा दिया और मुझे अपनी तरफ पलटने की कोशिश की. चूचियाँ इतनी ज़ोर से दबाई थी कि अब और नींद का नाटक करना मुश्किल था.मैने हड़बड़ा के गहरी नींद में से उठने का नाटक किया,
“ क्क्क…कौन ? पापा आप !”
पापा को तो जैसे बिजली का झटका लगा. नशे के कारण मानो सोचने की शक्ति ख़तम हो गयी थी. उनके हाथ अब भी मेरी चुचिओ पे थे.
“कंचन तुम ! बेटी तुम यहाँ कैसे ?” पापा हड़बड़ाते हुए बोले.
“ज्ज्ज्जी… मम्मी के सिर में बहुत दर्द हो रहा था, तबीयत बहुत खराब थी इसलिए उन्होने हमे यहाँ सुला दिया और वो हम कमरे में सो रही है. आप कब आए हमे पता ही नहीं चला.”
“ बेटी मैं तो अभी अभी आया. मैने समझा कि मम्मी यहाँ सो रही है.”
मैं उनके बदन पे हाथ रख के चौंकते हुए बोली,
“ हाई राम ! आप तो बिल्कुल नंगे…….. हमारा मतलब है… आपके…..आपके कपड़े..? और …और… ऊई.. माआ ये क्या ?…! हमारा ब्लाउस ……..?”
पापा अब बुरी तरह घबडा गये थे.
“देखो बेटी, हमें क्या मालूम था कि तुम यहाँ लेटी हो. हम तो समझे कि तुम्हारी मम्मी लेटी है.” पापा का लंड भी अब सिकुड़ने लगा था.
“लेकिन हमारे कपड़े क्यों….?”
“बेटी तुम तो शादीशुदा हो, तुम्हें तो समझना चाहिए. हमने तो मम्मी समझ के तुम्हारे कपड़े….”
“ओ ! समझी. आपको मम्मी की ज़रूरत है. ठीक है मम्मी को ही आपके पास भेज देती हूँ.”
“नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है. उन्हें सोने दो. तबीयत खराब है तो क्यों डिस्टर्ब करती हो. लेकिन बेटी, मम्मी को आज जो कुच्छ हुआ उसका पता नहीं लगना चाहिए. नहीं तो अनर्थ हो जाएगा. हम से जो कुच्छ हुआ अंजाने में हुआ.”“ आप फिकर क्यों करते हैं पापा ?. मम्मी को कुच्छ नहीं पता चलेगा.”
क्रमशः.........
शर्मा जी बेसब्री से बेटी के आने का इंतज़ार करने लगे. बिटिया की चूत में फँसी पॅंटी अब भी उनकी आखों के सामने घूम रही थी. बिटिया की चूत में से इस वक़्त निकलती हुई पेशाब की धार की कल्पना मात्र से उनका लंड हरकत करने लगा. इतने में कंचन पेशाब करके लॉन में आ गयी,
“चलिए पापा, मैं तैयार हूँ. लेकिन मैं सामने से आपके कंधों पे बैठूँगी ताकि गिरने लगूँ तो आप संभाल लेना.”
“नहीं गिरगी बेटी. खैर जैसे चाहो बैठो.”
शर्मा जी नीचे बैठे और कंचन सामने उनके कंधों के दोनो ओर टाँगें डाल कर बैठ गयी. अब तो शर्मा जी का मुँह बेटी की चूत से सटा हुआ था लेकिन स्कर्ट के ऊपर से. वो खड़े हो गये. कंचन बोली,
“ पापू, थोड़ा ऊपर उठाइए ना.. हाथ नहीं पहुँच रहा.”
शर्मा जी को बेटी को ऊपर की ओर उठाने के लिए उसके चूतरो को पकड़ना पड़ा. जैसे ही उन्होने बिटिया के चूतरो पर हाथ रखा उन्हें महसूस हुआ कि उनका आधा हाथ बेटी की पॅंटी पर और आधा हाथ उसके नंगे चूतरो पर था. उन्हें कुच्छ दिख वैसे भी नहीं रहा था क्योंकि उनका मुँह तो बेटी की टाँगों के बीच में दबा हुआ था.
“और थोड़ा ऊपर उठाओ, पापा.” कंचन चिल्लाई. शर्मा जी ने बेटी के चूतेर पकड़ कर उसे और ऊपर उठा दिया. स्कर्ट तो छ्होटी सी थी ही. कंचन के और ऊपर होने से उसकी स्कर्ट शर्मा जी के सिर के ऊपर आ गयी.
अब तो शर्मा जी का सिर बेटी की स्कर्ट के अंडर छुप गया था और उनका मुँह ठीक बेटी की चूत पर आ गया. अचानक शर्मा जी की नाक में बेटी की चूत की तेज़ महक गयी. आज तो उसकी चूत की खुश्बू बहुत तेज़ थी. इसका एक कारण था. कंचन ने धूलि हुई पॅंटी पहनने के बजाए जान के कल वाली ही पॅंटी पहनी हुई थी. दो दिन से पहनी हुई पॅंटी में से चूत की ज़ोरदार गंध तो आनी ही थी. शर्मा जी तो बिटिया की कुँवारी चूत की ज़ोरदार गंध से मदहोश हो गये. शर्मा जी को अपने होंठों पे गीलापन महसूस हुआ और वो समझ गये कि ये तो बेटी की पेशाब का गीलापन है क्योंकि अभी अभी तो वो पेशाब करके आई थी. अब तो शर्मा जी अपना आपा खो बैठे. उन्होने बेटी को और ऊपर उठाने के बहाने उसके चूतेर पकड़ के अपना मुँह बेटी की चूत में ज़ोर से दबा दिया. शर्मा जी ने अपने होंठ थोड़े से खोल दिए और बिटिया की पॅंटी में कसी फूली हुई चूत उनके मुँह में आ गयी. बिटिया की चूत की तेज़ स्मेल उनकी नाक में जा रही थी और उनका लंड अंडरवेर फाड़ कर बाहर निकलने को हो रहा था. उधेर कंचन को भी अपनी चूत पर पापा की गरम गरम साँसे महसूस हो रही थी. वो भी बास्केट ठीक करने के बहाने अपनी चूत पापा के मुँह पर रगड़ रही थी. नीलम ने फिर से मूवी कॅमरा शर्मा जी के लंड के उभार पे फोकस कर दिया. शर्मा जी को तो पता ही नहीं था कि नीलम उनका वीडियो बना रही है क्योंकि उनका मुँह तो बिटिया की स्कर्ट के नीचे च्छूपा हुआ उसकी चूत का आनंद ले रहा था. अब तो कंचन की पॅंटी उसके चूत के रस से गीली होने लगी थी. उसे डर था कि कहीं पापा को पता ना लग जाए. आख़िरी बार ज़ोर से पापा के मुँह में चूत को रगड़ती हुई बोली,
“ पापा ठीक हो गया नीचे उतारिये.”
शर्मा जी ने भी आख़िरी बार बेटी की पूरी चूत को मुँह में ले कर चूमा और बेटी को नीचे उतार दिया. शर्मा जी का चेहरा लाल हो रहा था और बिटिया के पेशाब से उनके होंठ नमकीन हो रहे थे. उनकी पॅंट तो ऐसे फूल गयी थी जैसे अंडरवेर पहना ही ना हो. शर्मा जी जल्दी से दूसरी ओर घूम गये और अंडर जाते हुए बोले,
“ चलो बच्चो खाना खा लो. कंचन बेटी नीलम को भी ले आओ.”
“जी पापू.” दोनो लड़कियाँ भी अंडर चली गयी. लेकिन शर्मा जी का ध्यान खाने में कहाँ. उनके मुँह में तो बिटिया की चूत का स्वाद था. खाना खा के वो उस स्वाद को खराब नहीं करना चाहते थे. जैसे ही शर्मा जी ऑफीस गये, दोनो सहेलियाँ वीडियो देखने लगी जिसमे शर्मा जी के लंड का उभार सॉफ नज़र आ रहा था. कंचन ये सोच कर बहुत खुश थी कि उसके पापा का लंड उसकी वजह से खड़ा हो गया था.
नीलम उसके चूतरो पे हाथ फेरते हुए बोली,
“हाई कंचन आज तो तेरे पापा ने तेरी चूत का स्वाद भी चख लिया. अब देख वो तेरे कैसे दीवाने हो जाते हैं.”
“हट पागल! तू तो सुचमुच बड़ी खराब है.”
“हाई मेरी जान, ये बता तुझे कैसा लगा?”
“हट ना.. मुझे तो शरम आती है.”
“हाई, अब कैसी शरम? जब अपने पापा के मुँह में चूत दे दी थी टब तो शरम आई नहीं. बता नाअ… मज़ा आया?” नीलम कंचन की चूत दबाती हुई बोली.
“इसस्स.. ये क्या कर रही है? छोड़ ना मेरी चूत. सच बताउ? आज ज़िंदगी में पहली बार किसी मरद के होंठ मेरी चूत पे लगे. ऊफ़! पापा ने मेरी चूत को काट क्यों नहीं लिया?”
“काटेंगे, काटेंगे. आज तो पहला दिन था. बिटिया की चूत मुँह में ले के उनकी भी नींद हराम हो जाएगी. अभी देख आगे आगे क्या होता है.” नीलम पॅंटी के ऊपर से ही कंचन की चूत मसल्ने लगी. कंचन की चूत रस छोड़ रही थी और उसकी पॅंटी बुरी तरह गीली होने लगी.
“इसस्सस्स…..आआईयईई… नीलम! छोड़ नाअ.. देख मेरी पॅंटी खराब हो रही है.”
“तेरी पॅंटी ही तो खराब करनी है. आज इस पॅंटी को पापा के बाथरूम में छोड़ देना. कल तक अपनी पॅंटी को पहचान नहीं पाएगी.”
अब तो कंचन का भी साहस बढ़ गया था. उसे अपने पापा को तड़पाने में बड़ा मज़ा आने लगा था. लेकिन वो पापा का लंड भी महसूस करना चाहती थी. उस दिन जब शाम को शर्मा जी ऑफीस से वापस आए तो कंचन अब भी उसी स्कूल की छ्होटी सी स्कर्ट में थी.
“अरे बेटी तुमने अभी तक कपड़े नहीं बदले?”
“नीलम अभी अभी गयी है. हम दोनो पढ़ रहे थे.”
“अच्छा बेटी मैं ज़रा नहा के आता हूँ.”
“नहीं पाप्पो आप बाद में जाना, मैं एक मिनिट में नहा के आती हूँ.”
“बिटिया तुम तो बहुत टाइम लगाती हो.”
“आप देख लेना मैं बस गयी और आई.”
“ठीक है जल्दी जाओ.”
कंचन ये ही तो चाहती थी. बाथरूम में जाते ही कंचन ने पेशाब किया और पॅंटी फिर से ऊपर चढ़ा के पेशाब का दाग लगा दिया. फिर उसने सारे कपड़े उतार दिए. पॅंटी को उतार कर उसने दरवाज़े के पीछे लगे हुक पर टाँग दिया. पॅंटी पर पेशाब का दाग सॉफ नज़र आ रहा था. कंचन ने देखा कि पॅंटी पे उसकी झांतों का एक बॉल भी चिपका हुआ है. कंचन ने अपनी चूत रगड़ कर तीन चार बाल और निकाल कर पॅंटी पे चिपका दिए. फिर वो जल्दी से नहा के बाहर निकल आई,
“जाइए पाप्पो. मैं नहा चुकी.”
शर्मा जी भी नहाने बाथरूम में चले गये. जैसे ही उन्होने बाथरूम का दरवाज़ा बन्द किया उनकी नज़र उसके पीछे हुक पर तंगी बेटी की पॅंटी पर गयी. शरमाजी का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा. आज करीब साल भर के बाद उन्हें बिटिया की पॅंटी इस तरह तंगी हुई मिली थी. सवेरे इसी पॅंटी में कसी हुई बिटिया की चूत उनके मुँह में थी. शर्मा जी ने काँपते हुए हाथो से बेटी की पॅंटी को अपने हाथ में लिया और पॅंटी के मुलायम कपड़े पर हाथ फेरने लगे. तभी शर्मा जी की नज़र पॅंटी पे चिपके हुए बिटिया की झांतों के बालों पे गयी. शर्मा जी का लॉडा फंफना गया. उन्होने जी भर के बिटिया की पॅंटी को चूमा और चाता. फिर जहाँ पेशाब का दाग लगा था उसे अपने तने हुआ लॉड के सुपारे पे रख उसकी चूत का गीलापन महसूस करने लगे. बिटिया की चूत की कल्पना करते हुए पॅंटी को अपने लंड पे रगड़ते हुए उन्होने ढेर सारा वीर्य उसकी पॅंटी में उंड़ेल दिया. जब रात को शर्मा जी सो गये तो कंचन चुपके से बाथरूम में गयी और अपनी पॅंटी देख कर उसका दिल धक धक करने लगे.
वीर्य तो वो पहले भी देख चुकी थी मम्मी की चूत और गांद में से बाहर बहता हुआ लेकिन आज ज़िंदगी में पहली बार मरद के वीर्य को हाथ लगा के देखा था. कंचन ने अपनी मम्मी को पापा का वीर्य पीते हुए देखा था. उससे ना रहा गया और उसने अपनी पॅंटी में लगे हुए वीर्य को चाट लिया. पापा का वीर्य चाटते हुए उसे बहुत खुशी हो रही थी क्योंकि ये अनुभव अभी तक सिर्फ़ उसकी मम्मी ने ही किया था. कंचन को अब अपनी मम्मी से थोड़ी थोड़ी जलन सी होने लगी थी.
नीलम अब कंचन के पीछे पड़ गयी की जिस दिन मम्मी वापस आने वाली हो उस दिन भी वो कंचन के साथ रहना चाहती थी. नीलम को पता था कि जिस दिन मम्मी वापस आएगी उस दिन फिर से सारी रात चुदाई का नज़ारा देखने को मिलेगा. वही हुआ. जिस दिन मम्मी वापस आई उस रात सिर दर्द का बहाना बना कर जल्दी ही सोने चली गयी. कंचन को लगा कि आज तो चुदाई देखने नहीं मिलेगी, पर नीलम बोली, “कंचन तू इतनी भोली क्यों है? सिर दर्द का तो बहाना है. तेरी मम्मी चुदवाने के लिए उतावली हो रही है.” हम दोनो जल्दी से अपने कमरे में पहुँच गये. नीलम की बात बिल्कुल सच निकली. मम्मी बिस्तेर पर चादर ओढ़ के लेटी हुई थी. जैसे ही पापा अंडर आए, बोली,
“ कितनी देर से इंतज़ार कर रही हूँ ? आ भी जाइए.”
पापा ने मम्मी की चादर उतार दी. मम्मी एकदम नंगी थी. उसके बाद का नज़ारा तो कंचन की ज़िंदगी का एक और यादगार नज़ारा बन गया. पापा ने मम्मी को पूरी रात कयि नयी नयी मुद्राओं में चोदा. नीलम और कंचन ने एक बार फिर से एक दूसरे की चूत चाट के अपनी प्यास को ठंडा किया. इसके बाद मम्मी पापा की चुदाई का नज़ारा एक बार और देखने को मिला . इतने में शर्मा जी ने एक कमरा घर के ऊपर बनवा लिया था. पापा मम्मी उस कमरे में शिफ्ट हो गये. ये कमरा कंचन के कमरे के ठीक ऊपर था. अब तो कभी कभी जब मम्मी ज़्यादा जोश में होती थी तभी उनके मुँह से चुदाई की आवाज़ें नीचे तक आती थी. पापा मम्मी की चुदाई देखने के बाद से कंचन की कामुकता बढ़ती जा रही थी. नीलम ने भी कंचन की चूत पर हाथ फेर फेर कर तंग कर रखा था. नीलम तो सुधीर से चुदवा कर अपनी प्यास बुझा लेती लेकिन कंचन तड़पति रह जाती. कंचन को अब एक मोटे लंबे लॉड की सख़्त ज़रूरत महसूस होने लगी थी. पापा का तना हुआ लंड अक्सर उसकी आँखों के सामने घूम जाता. कंचन की अब एक ही तमन्ना थी कि उसकी शादी ऐसे मर्द से हो जिसका लंड मोटा तगड़ा हो और उसे चोदने का शोक हो. जब से अपने भाई विकी के लंड के बारे में सुना था तब से उसके लंड की कल्पना से ही कंचन की चूत गीली हो जाती. अब जब भी नीलम कंचन के घर आती वो दोनो घंटों एक दूसरे के बदन के साथ खेलते और एक दूसरे की चूत चाटते. बड़ा मज़ा आता था, लेकिन वो मज़ा तो नहीं आ सकता था जो एक मरद के साथ आता है.
आख़िर मरद का मज़ा कंचन को शादी के बाद ही मिला.
दोस्तो यहाँ से कहानी अपनी वास्विकता मे आती है
रात के 12 बज रहे थे. मम्मी मेरे कमरे में नींद की गोली खा कर बेख़बर सो रही थी. लाइट आने का कोई अंदेशा नहीं था. बाहर तूफान अब भी ज़ोरों पर था. इधर मेरे दिल और दिमाग़ पर भी बचपन की यादों ने ज़ोर का तूफान ला दिया था. इतने में पापा के आने आवाज़ सुनाई दी. मैं झट से कॅंडल जला के मम्मी के बिस्तेर पे पेट के बल लेट गयी और चादर से मुँह धक लिया, लेकिन पेटिकोट को चूतरो तक ऊपर चढ़ा लिया. मेरी मांसल जांघें बिल्कुल नंगी थी. ध्यान से देखने वाले को जांघों के बीच से झँकति हुई गुलाबी पॅंटी की झलक भी मिल जाती. पापा कमरे में आए. शायद काफ़ी पी रखी थी. लरखरा रहे थे. अंडर आके उन्होने कपड़े उतारने शुरू किए. मेरे मन में एक बार आया की कह दूं मम्मी मेरे कमरे में सो रही है. मैं इसी उधेर बुन में थी कि पापा बिल्कुल नंगे हो गये. अब तो बहुत देर हो चुकी थी. अब तो जो होगा देखा जाएगा. मेरी नज़र उनके लॉड पे पर गयी. बिल्कुल सिकुदा हुआ नहीं था लेकिन खड़ा भी नहीं था. कॅंडल की रोशनी में बहुत मोटा और डरावना लग रहा था. बाप रे ! खड़ा हो के तो बहुत ही मोटा हो जाएगा. आज कयि बरसों के बाद पापा के लंड को देखा था. पहले से कहीं ज़्यादा काला और मोटा लग रहा था. पापा ने एक नज़र मेरी तरफ डाली. मेरी गोरी गोरी मांसल नंगी जांघें कॅंडल की लाइट में चमक रही थी. पापा थोड़ी देर तक मेरी नंगी टाँगों को देखते रहे. उनके लंड ने हरकत शुरू कर दी थी. उन्होने मेरी नंगी जांघों की ओर देख कर धीरे धीरे अपने लंड को दो तीन बार सहलाया और फिर बाथरूम में पेशाब करने चले गये. मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गयी. वापस आ के उन्होने मेरी ओर ललचाई नज़रों से देखा. उनका लंड थोड़ा और बड़ा हो चुक्का था. लंड में तनाव आना शुरू हो गया था. उनका इरादा सॉफ था. फिर उन्होने कॅंडल को बुझा दिया और नंगे ही बिस्तेर पे आ गये और मुझसे चिपक गये. मेरी पीठ उनकी ओर थी. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा. धीरे धीरे मेरे चूतरो को सहलाने लगे. उनका लंड तन चुका था और मेरे चूतरो की दरार में चुभ रहा था. मैं गहरी नींद में होने का बहाना कर रही थी. पापा ने मेरा पेटिकोट मेरे चूतरो के ऊपेर खिसका दिया. अब तो मेरे विशाल नितुंबों की इज़्ज़त मेरी छ्होटी सी पॅंटी के हाथ में थी. पेटिकोट ऊपर करके पॅंटी के ऊपेर से ही मेरे चूतरो को सहलाते हुए बोले,
“कविता, सो गयी क्या? इतना तो मत तडपाओ मेरी जान. आज बरसों बाद तो तुम्हें चोदने का मौका मिला है.” मैं चुप रही. अब पापा ने मेरी टाँगों के बीच हाथ सरका दिया और पॅंटी के ऊपेर से मेरी चूत सहलाते हुए बोले,
‘क्या बात है मेरी जान आज तो तुम्हारी चूत कुच्छ ज़्यादा ही फूली हुई लग रही है?’ मैं तो बिल्कुल चुपचाप पड़ी रही. मेरी चूत अब गीली होने लगी थी. कोई जबाब ना मिला तो बोले,
“ समझा, बहुत नाराज़ लग रही हो. माफ़ कर दो मेरी जान, थोरी देर हो गयी. देखो ना ये लॉडा तुम्हारे लिए कैसा पागल हो रहा है.” यह कहते हुए उन्होने अपना तना हुआ लॉडा मेरे चूतरो से सटा दिया और एक हाथ सामने डाल कर धीरे धीरे मेरी चूचियाँ सहलाने लगे. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा. मेरी हिम्मत टूट रही थी लेकिन अब कोई चारा नहीं था. धीरे धीरे पापा ने मेरे ब्लाउस के बटन खोलने शुरू कर दिए. ब्रा तो पहना नहीं था. पीठ नंगी हो गयी. उनके मोटे लॉड ने मेरी पॅंटी को चूतरो की दरार में धकेल दिया था. मेरी चूत बुरी तरह से गीली हो गयी थी. अब पापा ने मेरी बारी बारी नंगी चूचिओ को सहलाना शुरू कर दिया. मेरे निपल तन गये थे. अचानक पापा ने मेरी चूचिओ को पकड़ कर ज़ोर से दबा दिया और मुझे अपनी तरफ पलटने की कोशिश की. चूचियाँ इतनी ज़ोर से दबाई थी कि अब और नींद का नाटक करना मुश्किल था.मैने हड़बड़ा के गहरी नींद में से उठने का नाटक किया,
“ क्क्क…कौन ? पापा आप !”
पापा को तो जैसे बिजली का झटका लगा. नशे के कारण मानो सोचने की शक्ति ख़तम हो गयी थी. उनके हाथ अब भी मेरी चुचिओ पे थे.
“कंचन तुम ! बेटी तुम यहाँ कैसे ?” पापा हड़बड़ाते हुए बोले.
“ज्ज्ज्जी… मम्मी के सिर में बहुत दर्द हो रहा था, तबीयत बहुत खराब थी इसलिए उन्होने हमे यहाँ सुला दिया और वो हम कमरे में सो रही है. आप कब आए हमे पता ही नहीं चला.”
“ बेटी मैं तो अभी अभी आया. मैने समझा कि मम्मी यहाँ सो रही है.”
मैं उनके बदन पे हाथ रख के चौंकते हुए बोली,
“ हाई राम ! आप तो बिल्कुल नंगे…….. हमारा मतलब है… आपके…..आपके कपड़े..? और …और… ऊई.. माआ ये क्या ?…! हमारा ब्लाउस ……..?”
पापा अब बुरी तरह घबडा गये थे.
“देखो बेटी, हमें क्या मालूम था कि तुम यहाँ लेटी हो. हम तो समझे कि तुम्हारी मम्मी लेटी है.” पापा का लंड भी अब सिकुड़ने लगा था.
“लेकिन हमारे कपड़े क्यों….?”
“बेटी तुम तो शादीशुदा हो, तुम्हें तो समझना चाहिए. हमने तो मम्मी समझ के तुम्हारे कपड़े….”
“ओ ! समझी. आपको मम्मी की ज़रूरत है. ठीक है मम्मी को ही आपके पास भेज देती हूँ.”
“नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है. उन्हें सोने दो. तबीयत खराब है तो क्यों डिस्टर्ब करती हो. लेकिन बेटी, मम्मी को आज जो कुच्छ हुआ उसका पता नहीं लगना चाहिए. नहीं तो अनर्थ हो जाएगा. हम से जो कुच्छ हुआ अंजाने में हुआ.”“ आप फिकर क्यों करते हैं पापा ?. मम्मी को कुच्छ नहीं पता चलेगा.”
क्रमशः.........
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